सर्विस टैक्स रिफंड का अड़ंगा
मौजूदा GST सिस्टम भारतीय निर्माताओं के लिए एक बड़ी बाधा खड़ी कर रहा है। 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' की स्थिति में, जब कंपनियां अपने इनपुट (सामान) पर बिक्री पर वसूलने वाले टैक्स से ज्यादा टैक्स चुकाती हैं, तो उन्हें केवल माल पर लगे टैक्स का ही रिफंड मिलता है। सर्विसेज पर चुकाया गया टैक्स एक स्थायी लागत बन जाता है, जिससे उनका जरूरी वर्किंग कैपिटल फंस जाता है।
फंसा हुआ सर्विस टैक्स कैसे बढ़ाता है लागत?
यह स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि आईटी, लॉजिस्टिक्स, कंसल्टिंग और मार्केटिंग जैसी सेवाओं पर चुकाया गया 18% जीएसटी, निर्माताओं के लिए एक स्थायी लागत बन जाता है। जबकि इनपुट गुड्स पर टैक्स रिफंड योग्य होता है, सर्विस टैक्स का रिफंड न मिलने से कंपनियों का कैश फ्लो सीमित हो जाता है। यह खास तौर पर फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) और फार्मा जैसे सेक्टरों के लिए बड़ी चुनौती है, जो ऊंचे सेल्स वॉल्यूम और पतले प्रॉफिट मार्जिन पर चलते हैं। हाल ही में कई FMCG प्रोडक्ट्स पर जीएसटी की दरें घटाकर 5% कर दी गई हैं, जिससे यह गैप और बढ़ गया है, जबकि सेवाओं पर टैक्स अक्सर 18% बना रहता है। इसके साथ ही, भारत की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान (GVA) भी करीब 17% पर ही रुका हुआ है।
भारत का GST, दुनिया से अलग
यह नियम कई ग्लोबल वैट (VAT) और जीएसटी सिस्टम से अलग है। यूरोपीय संघ (European Union) और यूनाइटेड किंगडम (UK) जैसे देशों में, कंपनियां आम तौर पर गुड्स और सर्विस दोनों पर टैक्स क्रेडिट का दावा कर सकती हैं, जिससे टैक्स का बेहतर और निष्पक्ष व्यवहार सुनिश्चित होता है। भारत के GST कानून में रिफंड का प्रावधान है, लेकिन 'इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर' के मामलों में सर्विसेज को बाहर रखना लंबे समय से बहस का मुद्दा रहा है। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मुद्दों को स्वीकार किया है और जीएसटी काउंसिल से नियमों पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।
'मेक इन इंडिया' और कंपीटिटिवनेस पर असर
उद्योग समूह लगातार इस समस्या को उठा रहे हैं, और उम्मीद है कि मई-जून 2026 में होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में इस पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीतिगत खामी भारतीय विनिर्माण की वैश्विक स्थिति के लिए एक बड़ा खतरा है। 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई (PLI) स्कीम्स जैसी सरकारी पहलों को भी इससे झटका लगता है, जिनका मकसद स्थानीय उत्पादन और एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है। अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, जो संचित टैक्स क्रेडिट की व्यापक वापसी की अनुमति देती हैं, भारत के सख्त नियम प्रभावी उत्पादन लागत बढ़ाते हैं। इससे परिचालन व्यय बढ़ता है और भारतीय सामान आयात की तुलना में कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।
छोटे और मध्यम आकार के व्यवसाय (MSMEs) विशेष रूप से कमजोर हैं। फंसा हुआ पैसा उत्पादन को बाधित कर सकता है, भुगतान में देरी कर सकता है और वित्तीय कठिनाइयां पैदा कर सकता है।
GST काउंसिल की बैठक: एक अहम फैसला
सभी की निगाहें अब मई-जून 2026 की आगामी जीएसटी काउंसिल बैठक पर टिकी हैं, जो सर्विस टैक्स रिफंड के मुद्दे को सुलझाने के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। उद्योग समूहों ने बार-बार इस चिंता को उठाया है, और सुप्रीम कोर्ट की पिछली टिप्पणियां भी बदलाव की मांग का समर्थन करती हैं। यह बैठक भारत की विनिर्माण लागत-प्रतिस्पर्धा और भविष्य के विकास को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
