खपत और क्रेडिट का मजबूत तालमेल
भारत की आर्थिक मजबूती का आधार अब सरकारी खर्चे से हटकर निजी खपत और क्रेडिट पेनिट्रेशन (Credit Penetration) की ओर बढ़ रहा है। बाहरी विश्लेषक अक्सर ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के दाम और महंगाई को सीधे जोड़कर देखते हैं, लेकिन असल तस्वीर कुछ अलग है। मौजूदा आर्थिक तेजी को घरों से होने वाली जबरदस्त खरीदारी से बल मिला है। ऑटोमोबाइल रिटेल और सीमेंट की मांग में दो अंकों की ग्रोथ इसी बात का सबूत है कि आम आदमी ऊर्जा की कीमतों के सीधे असर से काफी हद तक बचा हुआ है।
इस घरेलू रफ्तार को सपोर्ट मिल रहा है बेहतर क्रेडिट माहौल से। पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के मुकाबले बैंकिंग लिक्विडिटी (Banking Liquidity) अब सामान्य हो रही है, जिससे कैपिटल की लागत (Cost of Capital) कम हो रही है। यह कंपनियों के लिए निवेश का अच्छा मौका बन रहा है और महंगाई के दबाव को कम करने में मदद कर रहा है।
रिफाइनिंग मार्जिन और बाहरी बचाव
भारत की एनर्जी स्ट्रैटेजी (Energy Strategy) का एक अहम पहलू है डोमेस्टिक रिफाइनिंग क्षमता, जो इकोनॉमी को स्थिर रखने में मदद करती है। भारत रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का नेट एक्सपोर्टर (Net Exporter) है, जिसका मतलब है कि डोमेस्टिक ऑयल मार्केटिंग कंपनियां वैल्यू चेन (Value Chain) का हिस्सा खुद संभाल लेती हैं। जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो इन कंपनियों के ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (Gross Refining Margins) में बढ़ोतरी होती है, जो एक तरह से खुद को ठीक करने वाला मैकेनिज्म (Self-correcting Mechanism) है। इससे सरकार पर फ्यूल की कीमतों को तेजी से बढ़ाने का दबाव कम होता है और वह ग्रोथ पर फोकस बनाए रख पाती है।
इसके अलावा, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा तेल भंडार जारी करने से सप्लाई को एक सहारा मिला है, जिससे फ्यूल सब्सिडी (Fuel Subsidy) की तत्काल जरूरत कम हो गई है। इससे पॉलिसीमेकर्स (Policymakers) को ग्रोथ पर केंद्रित रहने का मौका मिला है, न कि छोटी-मोटी दिक्कतों से निपटने पर।
खतरे की घंटी: स्ट्रक्चरल कमजोरियां
हालांकि, अच्छी तस्वीर के बावजूद कुछ कमजोरियां भी हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर लगातार बनी रहीं, तो रिफाइनिंग मार्जिन का मौजूदा सुरक्षा कवच खत्म हो सकता है। ऐसे में सरकार को फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) बढ़ाने या फिर ग्राहकों से ज्यादा कीमत वसूलने के बीच मुश्किल फैसला लेना होगा।
इसके अलावा, क्रेडिट पर आधारित ग्रोथ ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील है। अगर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) को अपनी करेंसी की वैल्यू बचाने के लिए सख्ती करनी पड़ी, तो कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। भारत की एनर्जी पोर्टफोलियो (Energy Portfolio) में विविधता की कमी है और यह ग्लोबल ऑयल सप्लाई (Global Oil Supply) पर निर्भर है। किसी भी तरह की भू-राजनीतिक अस्थिरता (Geopolitical Instability) देश के ट्रेड बैलेंस (Trade Balance) को खतरे में डाल सकती है और GDP के अनुमानों को बदलना पड़ सकता है। यह दिखाता है कि हमारी ग्रोथ मॉडल कुछ हद तक कम ऊर्जा कीमतों पर निर्भर है।
