भारत की आर्थिक तरक्की के लिए एक बड़ी चुनौती सामने है। शहरी महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर सिर्फ **22.2%** है, जो भविष्य की आर्थिक विकास की राह में एक बड़ी रुकावट बन सकती है। इस अंतर को पाटने के लिए सरकार ने EEE कमेटी का गठन किया है, जिसका मकसद शिक्षा और रोज़गार के बीच की खाई को कम करना और उत्पादकता को बढ़ाना है।
शिक्षा और रोज़गार के बीच की खाई
भारत इस समय मज़बूत आर्थिक विकास के दौर से गुज़र रहा है, और 2026-27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 6.5% रखा गया है। 2021 से 2025 के बीच अर्थव्यवस्था ने 8.56% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) हासिल की है। लेकिन, इस विकास की रफ्तार को बनाए रखने के लिए आबादी के बड़े हिस्से को औपचारिक कार्यबल में शामिल करना बहुत ज़रूरी है।
Periodic Labour Force Survey 2025 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं की कुल श्रम बल भागीदारी दर (Female Labour Force Participation Rate) 2025 में बढ़कर 30.7% हो गई है, जो 2022 में 25.4% थी। यह एक अच्छी खबर है, लेकिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच एक बड़ा अंतर है। ग्रामीण इलाकों में भागीदारी 34.6% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह दर काफी कम, यानी 22.2% है। शहरी युवा महिलाओं में बेरोज़गारी दर 18.9% है, जो पुरुषों की तुलना में ज़्यादा है। यह दर्शाता है कि बाज़ार में उपलब्ध अवसरों और महिलाओं के पास मौजूद हुनर के बीच तालमेल की कमी है।
घर और देखभाल की ज़िम्मेदारियों का असर
Time Use Survey 2024 के मुताबिक, घरेलू कामों और देखभाल की ज़िम्मेदारियों में महिलाओं का समय ज़्यादा लगता है। शहरी भारत में, महिलाएं हर दिन औसत 289 मिनट घरेलू कामों में और 137 मिनट देखभाल (caregiving) के कामों में खर्च करती हैं। यह अतिरिक्त समय उन्हें औपचारिक रोज़गार के लिए कम घंटे समर्पित करने की अनुमति देता है, जो उनके करियर के विकास और कार्यबल में बने रहने के लिए एक बड़ी बाधा है।
सरकारी रणनीति और भविष्य की राह
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, Union Budget 2026-27 में NITI Aayog के मार्गदर्शन में Education-to-Employment-and-Enterprise (EEE) कमेटी का ऐलान किया गया था। इस पहल का उद्देश्य यह समझना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकें भविष्य की नौकरियों को कैसे बदलेंगी और शैक्षिक परिणामों को उद्योग की ज़रूरतों के साथ कैसे बेहतर ढंग से जोड़ा जाए। कमेटी ने 22 मई को अपनी पहली बैठक इसी रणनीतिक लक्ष्य पर केंद्रित की थी।
निवेशकों और बाज़ार विश्लेषकों के लिए, 'केयर इकोनॉमी' (care economy) को लक्षित करने वाली नीतियों का कार्यान्वयन एक महत्वपूर्ण पहलू होगा। सस्ती चाइल्डकेयर और एल्डरकेयर सेवाओं में निवेश को प्रगति का मुख्य संकेतक माना जाएगा। यह देखना अहम होगा कि ये उपाय शहरी महिलाओं की भागीदारी दर को बढ़ाने में कितने प्रभावी साबित होते हैं, जिससे भारत अपनी मानव पूंजी का पूरी तरह से उपयोग कर सके और लंबी अवधि के आर्थिक विकास की गति को बनाए रख सके।
