भारत में इथेनॉल की धूम क्यों?
केंद्रीय मंत्री Nitin Gadkari किसानों को 'ऊर्जादाता' बनाने और देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का बड़ा विजन लेकर चल रहे हैं। इसका सीधा असर देश के ₹22 लाख करोड़ सालाना के भारी-भरकम फॉसिल फ्यूल इंपोर्ट बिल को कम करने पर पड़ेगा। इस सरकारी पुश को ↑ कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रहे इजाफे का भी साथ मिल रहा है। हाल ही में Brent क्रूड $80 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया था, जिससे भारत का सालाना तेल आयात बिल $70 बिलियन तक बढ़ सकता है। ऐसे में, इथेनॉल जैसे घरेलू विकल्प न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि आर्थिक मजबूती के लिए भी जरूरी हो गए हैं। इन फैक्टरों ने बाजार में हलचल मचा दी है, और हाल ही में इथेनॉल उत्पादन से जुड़ी शुगर कंपनियों जैसे Shree Renuka Sugars और Bajaj Hindusthan Sugar के शेयरों में 11% तक की तेजी देखी गई है।
सेक्टर की ग्रोथ और कंपनियों का हाल
भारत का इथेनॉल मार्केट, जिसकी वैल्यू 2023 में करीब $6.51 बिलियन थी, 2029 तक 8.84% की CAGR से बढ़कर $10 बिलियन के पार जाने का अनुमान है। सरकार का 2025-2026 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य इस सेक्टर के लिए एक बड़ा डिमांड ड्राइवर है। Shree Renuka Sugars, जिसकी इथेनॉल उत्पादन क्षमता 1,250 KL प्रतिदिन है, एक प्रमुख खिलाड़ी है। वहीं, Dhampur Sugar Mills जैसी कंपनियां भी अपने डिस्टिलरी जैसे इंटीग्रेटेड फैसिलिटी से फायदा उठा रही हैं और इनका P/E रेश्यो करीब 13.35 है। हालांकि, सभी कंपनियों की वित्तीय सेहत एक जैसी नहीं है। Shree Renuka Sugars का P/E रेश्यो निगेटिव है, जो नुकसान का संकेत देता है, और शेयर प्रति बुक वैल्यू भी निगेटिव है। Bajaj Hindusthan Sugar का P/E भी निगेटिव है। यह दिखाता है कि यह सेक्टर काफी हद तक सरकारी नीतियों और कमोडिटी कीमतों पर निर्भर है, न कि सिर्फ ऑपरेशनल मुनाफे पर।
इथेनॉल के भविष्य को आकार देने वाले फैक्टर और जोखिम
सरकारी समर्थन और तेल आयात कम करने की जरूरत के बावजूद, इथेनॉल सेक्टर की ग्रोथ लगातार नीतिगत समर्थन और स्थिर फीडस्टॉक कीमतों पर निर्भर करेगी। बायोफ्यूल्स पर नेशनल पॉलिसी का लक्ष्य इथेनॉल उत्पादन बढ़ाना है। ↑ कच्चे तेल की ऊंची कीमतें शुगर कंपनियों के लिए गन्ने और अनाज को इथेनॉल में बदलने को फायदेमंद बना रही हैं, जिससे शुगर कंपनियों को फायदा हो रहा है। इसके अलावा, ब्राजील जैसे देशों से शुगर आउटपुट में संभावित कमी से ग्लोबल शुगर प्राइस बढ़ सकते हैं, जिससे भारतीय उत्पादकों को लाभ होगा। हालांकि, सेक्टर को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एनालिस्ट्स का कहना है कि ↑ कच्चे तेल की ऊंची कीमतें इथेनॉल को आकर्षक बनाती हैं, लेकिन प्रदर्शन अभी भी सरकारी नीतियों, ब्लेंडिंग टारगेट्स और कच्चे माल (गन्ना, अनाज) की लागत और उपलब्धता पर निर्भर करता है। कई बड़ी कंपनियां, जिनमें Shree Renuka Sugars और Bajaj Hindusthan Sugar शामिल हैं, निगेटिव P/E रेश्यो पर काम कर रही हैं, जिसका मतलब है कि वे प्रति शेयर मुनाफा नहीं कमा रही हैं। यह सेक्टर की सरकारी नीतियों और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव पर अत्यधिक निर्भरता को दर्शाता है। Dhampur Sugar Mills का P/E रेश्यो पॉजिटिव है, लेकिन इसका रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) केवल 4.65% है, जो कैपिटल एफिशिएंसी में सुधार की गुंजाइश दिखाता है। सेक्टर में भारी क्षमता का निर्माण भी ओवरसप्लाई का जोखिम पैदा करता है, अगर डिमांड टारगेट पूरे नहीं हुए या फीडस्टॉक की उपलब्धता बाधित हुई।
आगे क्या? नीतिगत समर्थन से ग्रोथ की उम्मीद
भारतीय बायोफ्यूल मार्केट में सरकारी नीतियों, ↑ कच्चे तेल के आयात लागत में वृद्धि और क्लीनर एनर्जी की ओर वैश्विक बदलाव के कारण ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है। अनुमान है कि यह मार्केट 2034 तक 5.57% की CAGR से बढ़कर USD 10.2 बिलियन तक पहुंच सकता है। सरकार अपने इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को लेकर आश्वस्त है, जिसने कच्चे तेल के आयात में लाखों टन की कटौती की है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बायोफ्यूल्स के रणनीतिक महत्व को दर्शाता है। हालांकि, इस सफलता के लिए लगातार सहायक नियामक माहौल और कमोडिटी प्राइस साइकल को नेविगेट करने की सेक्टर की क्षमता महत्वपूर्ण होगी।
