फाइनेंशियल ईयर 2027 की शुरुआत भारत के लिए थोड़ी चिंताजनक रही है। पहले दो महीनों (अप्रैल-मई) में ही देश का फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) यानी राजकोषीय घाटा **₹1.6 ट्रिलियन** तक पहुंच गया है, जो पूरे साल के बजट का लगभग **10%** है। यह पिछले सालों के मुकाबले इस अवधि में काफी ज्यादा है।
राजस्व में कमी, खर्च में इजाफा
राजकोषीय घाटे में इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह सरकार की आमदनी में आई कमी है। अप्रैल और मई में, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में टैक्स से होने वाली आमदनी 2% घट गई है। जबकि पिछले फाइनेंशियल ईयर में इसी दौरान 28% की बंपर ग्रोथ देखी गई थी। टैक्स के अलावा, डिविडेंड (Dividend) और फीस जैसे दूसरे जरियों से होने वाली आमदनी में भी 2% की गिरावट आई है। सरकार की पब्लिक सेक्टर कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने या एसेट्स को मोनेटाइज करने से उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हुई है।
इंफ्रास्ट्रक्चर पर जारी है भारी खर्च
आय में कमी के बावजूद, सरकार कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) यानी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट्स पर खर्च को बनाए हुए है। इस साल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कुल ₹12.2 ट्रिलियन का बजट रखा गया था, जिसमें से पहले दो महीनों में ही ₹2.5 ट्रिलियन खर्च किए जा चुके हैं। यह पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 13% ज्यादा है। हालांकि, यह खर्च इकोनॉमी को बूस्ट करने के लिए जरूरी है, लेकिन इसने कुल सरकारी खर्च को 18% तक बढ़ा दिया है।
सब्सिडी और ब्याज का बढ़ता बोझ
इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा, सरकार पर दूसरे खर्चों का बोझ भी बढ़ा है। फर्टिलाइजर सब्सिडी (Fertilizer Subsidy) ₹345 अरब तक पहुंच गई है, जो इस अवधि के लिए ऐतिहासिक औसत ₹200 अरब से काफी ज्यादा है। इसके साथ ही, पुराने कर्जों पर ब्याज का भुगतान और डिफेंस (Defense) पर बढ़ता खर्च भी कुल एक्सपेंडिचर को बढ़ा रहा है। अब पेंशन, राज्यों को ट्रांसफर और डिफेंस जैसे खर्च मिलकर कुल सरकारी खर्च का 80% हो गए हैं।
सरकार कैसे मैनेज कर रही है कैश फ्लो?
इन खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से मिलने वाले डिविडेंड पर ज्यादा निर्भर हो गई है। इस दो-महीने की अवधि में नॉन-टैक्स रेवेन्यू (Non-Tax Revenue) का 82% हिस्सा RBI के डिविडेंड से आया है। इसके अलावा, नेशनल स्मॉल सेविंग्स फंड (National Small Savings Fund) में 85% की जोरदार बढ़ोतरी ने भी कैश फ्लो को सहारा दिया है। यह सरकार को अपनी तात्कालिक देनदारियों को पूरा करने और कर्ज चुकाने में मदद कर रहा है। अब निवेशकों की नजरें आने वाले महीनों में सरकार की टैक्स कलेक्शन बढ़ाने की क्षमता पर होंगी, क्योंकि यह तय करेगा कि साल के बाकी हिस्से में फिस्कल डेफिसिट बजट के तय दायरे में रहेगा या नहीं।
