तेल का बम और गिरता रुपया, बढ़ी मुश्किलें
दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर निकल गई हैं। यह भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण होलसेल इन्फ्लेशन पहले से ही 8.3% पर है, और इसमें ईंधन (Fuel) व बिजली की लागत में लगभग 25% की बढ़ोतरी हो चुकी है। अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 की दूसरी छमाही तक रिटेल इन्फ्लेशन बढ़कर 6-7% तक पहुंच सकती है।
इसी बीच, भारतीय रुपया भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.18 के स्तर तक गिर गया है, जो पिछले साल के मुकाबले काफी बड़ी गिरावट है। तेल और अन्य ज़रूरी चीज़ों के आयात पर बढ़ता खर्च और कमजोर रुपया, इन सब वजहों से देश में स्टैगफ्लेशन (Stagflation) का माहौल बन रहा है, यानी महंगाई तो बढ़ेगी पर आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ जाएगी।
सरकारी कंपनियों और बजट पर दबाव
भारत अपनी ज़रूरत का करीब 85% कच्चा तेल (Crude Oil) आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेज़ी से सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) के प्रॉफिट मार्जिन पर भारी दबाव आ रहा है। एनालिस्ट्स का मानना है कि हालिया फ्यूल प्राइस हाइक भी मौजूदा नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं है, जिसका मतलब है कि रिटेल कीमतों में और बढ़ोतरी की ज़रूरत पड़ सकती है। इन कंपनियों का P/E रेश्यो IOC के लिए करीब 5.20, BPCL के लिए 4.94 और HPCL के लिए लगभग 4.22 है, जो आकर्षक लग सकता है, लेकिन ये कंपनियाँ तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति काफी संवेदनशील हैं।
सरकार के बजट पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा। तेल के ऊंचे दाम से इंपोर्ट बिल बढ़ेगा, जिससे ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और चौड़ा हो सकता है। इसके लिए या तो सरकार को ज़्यादा सब्सिडी देनी पड़ेगी या फिर उधार लेना पड़ेगा, जिससे उसके खर्च करने की योजनाओं पर असर पड़ सकता है।
ग्लोबल मार्केट का असर और भारत की चुनौती
हालांकि, हाल के दिनों में इमर्जिंग मार्केट स्टॉक्स ने डेवलप्ड मार्केट्स को पीछे छोड़ा है। लेकिन भारत के सामने तेल की ऊंची कीमतें, गिरता रुपया और बढ़ती महंगाई जैसी कई बड़ी चुनौतियाँ हैं। अमेरिकी 10-साल की ट्रेजरी यील्ड (US 10-year Treasury yield) का 4.63% के करीब रहना इमर्जिंग मार्केट्स के लिए बरोइंग कॉस्ट (Borrowing cost) बढ़ा रहा है।
ऐतिहासिक रूप से, जब तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार रही हैं, तब भारत में करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) बढ़ा है और करेंसी कमजोर हुई है, जैसा कि 2011 से 2013 के बीच देखा गया था। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे इलाकों में बढ़ता तनाव कीमतों को और बढ़ा सकता है।
रुपया गिरने से स्टैगफ्लेशन की चिंता बढ़ी
सबसे बड़ी चिंता यह है कि देश लंबे समय तक स्टैगफ्लेशन के दौर से गुज़र सकता है। तेल की ऊंची कीमतों का सीधा असर महंगाई पर पड़ रहा है, और कमजोर होते रुपये के साथ यह एक ऐसा चक्र बना रहा है जो फॉरेन इन्वेस्टमेंट को हतोत्साहित कर सकता है और डोमेस्टिक डिमांड को धीमा कर सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, होलसेल इन्फ्लेशन 10% के पार जा सकती है, और कई संस्थान FY27 के लिए जीडीपी ग्रोथ फोरकास्ट (GDP Growth Forecast) घटा रहे हैं। ट्रेड डेफिसिट और फॉरेन इन्वेस्टर्स की निकासी से रुपया और कमजोर हो रहा है। USD/INR का रेट 100 का आंकड़ा पार कर सकता है।
आगे का रास्ता और एक्सपर्ट्स की राय
एनालिस्ट्स इन जुड़े हुए खतरों पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। मौजूदा हालात बता रहे हैं कि आने वाला समय कठिन हो सकता है, जिसमें ऊंची महंगाई, कमजोर करेंसी और धीमी आर्थिक ग्रोथ का सामना करना पड़ सकता है। इमर्जिंग मार्केट्स की मजबूती इन दबावों से निपटने की क्षमता पर परखी जाएगी। अब देखना यह है कि सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) इन मुश्किलों का सामना कैसे करते हैं, ताकि ग्लोबल मार्केट की अनिश्चितताओं के बीच महंगाई को काबू में रखते हुए ग्रोथ को भी सहारा दिया जा सके।