वैश्विक ऊर्जा बाज़ार भू-राजनीतिक तनावों के कारण अस्थिर बना हुआ है, जो India के लिए एक बड़ी चिंता है क्योंकि देश अपनी 85% से ज़्यादा ज़रूरत का कच्चा तेल (Crude Oil) आयात (Import) करता है। हाल ही में 14 मई, 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें बढ़कर लगभग $106.19 प्रति बैरल तक पहुँच गईं, जो पिछले साल की तुलना में 64% से भी ज़्यादा की बढ़ोतरी है।
बाजारों पर इसका तुरंत असर मिला-जुला रहा। India का निफ्टी 50 (Nifty 50) इंडेक्स आज 1.16% नीचे कारोबार कर रहा था। भारतीय रुपया (Indian Rupee) भी दबाव में है और अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले लगभग ₹95.7125 पर बना हुआ है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो साल के अंत तक रुपया 96-98 के दायरे में और गिर सकता है, जिससे आयात की लागत और बढ़ जाएगी।
India का तेल आयात पर भारी निर्भरता ऐतिहासिक रूप से इसे कीमतों के झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती रही है, जैसे कि 1970 और 1990 के दशक में हुआ था। हालाँकि सीधे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर असर सरकारी हस्तक्षेप से अक्सर कम हो जाता है, बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेल की कीमतों के झटके पांच तिमाहियों (quarters) तक मुद्रास्फीति (Inflation) को प्रभावित कर सकते हैं। इसमें थोक ईंधन कीमतों (WPI-Fuel) के साथ 0.69 का सहसंबंध (correlation) पाया गया था, जो FY07-FY16 के दौरान दर्ज किया गया था।
एक महत्वपूर्ण छिपी हुई लागत (hidden cost) उपभोक्ताओं को कीमतों में वृद्धि से बचाने के लिए सरकार का खर्च है। हालाँकि वर्तमान आंकड़े विस्तृत नहीं हैं, पिछले ऊंचे मूल्य परिदृश्यों में ईंधन सब्सिडी (fuel subsidy) का बोझ ₹53,000 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान लगाया गया था। जीवाश्म ईंधन सब्सिडी में कमी आई है, लेकिन बिजली सब्सिडी रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। ये हस्तक्षेप सीधे फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) पर दबाव डालते हैं। अनुमान बताते हैं कि सरकार अपने FY2027 के घाटे के लक्ष्य को पार कर सकती है। घरेलू कीमतों को सब्सिडी देकर अप्रत्यक्ष रूप से फिस्कल डेफिसिट को बढ़ावा मिलता है, जो मुद्रास्फीति और मुद्रा के अवमूल्यन (depreciation) में योगदान कर सकता है।
ऊंची तेल कीमतों का एक मुख्य कारण करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) का चौड़ा होना है। अनुमान है कि FY27 में यह घाटा जीडीपी (GDP) का 1.8% तक पहुँच सकता है, और यदि ब्रेंट क्रूड का औसत $110 प्रति बैरल रहा तो यह 3% तक जा सकता है, जो कि महामारी के बाद से औसतन 1% रहे घाटे की तुलना में वृद्धि है। India का CAD दिसंबर 2025 की तिमाही में बढ़कर $13.2 बिलियन हो गया था। India के विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) में भी गिरावट आई है, जो फरवरी 2026 के अंत में $728 बिलियन था, वह 1 मई, 2026 तक घटकर $690 बिलियन रह गया है। यह गिरावट संभवतः कमजोर पूंजी प्रवाह (capital inflows) के बीच रुपये को सहारा देने के लिए किए गए हस्तक्षेपों के कारण हुई है।
पश्चिम एशिया में लंबे समय से चल रहे भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण चिंताएं बढ़ रही हैं कि India की मैक्रोइकॉनोमिक स्थिरता (macroeconomic stability) ऐतिहासिक मिसालों से परे जांची जा सकती है। तेल आयात बिलों और सब्सिडियों को प्रबंधित करने के लिए फिस्कल डेफिसिट का विस्तार करने पर निर्भरता एक ऐसा चक्र बनाती है जहां मुद्रास्फीति और मुद्रा का अवमूल्यन (currency depreciation) होने की संभावना है, खासकर जब पूंजी प्रवाह धीमा हो। हस्तक्षेप की लागतें, हालांकि प्रत्यक्ष मूल्य वृद्धि की तुलना में कम दिखाई देती हैं, राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग करती हैं जिनका उपयोग विकास या उन्नति के लिए किया जा सकता था।
विश्लेषक ब्रेंट क्रूड के लिए जारी अस्थिरता का अनुमान लगा रहे हैं, कुछ का मानना है कि FY27 में इसका औसत $90-95 प्रति बैरल रहेगा। भारतीय रुपये के और कमजोर होने की व्यापक भविष्यवाणी की गई है, जिसमें 2026 के अंत तक 96-98 प्रति डॉलर की सीमा का अनुमान लगाया गया है, खासकर यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं। मॉर्गन स्टैनली (Morgan Stanley) का अनुमान है कि उच्च उत्पादन लागत, कमजोर रुपया और कोर इन्फ्लेशन (core inflation) के प्रभावों के कारण FY2027 के लिए India का सीपीआई मुद्रास्फीति (CPI inflation) औसत 4.7% रहेगा। भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) को मुद्रा को प्रबंधित करने के लिए अधिक सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करने की आवश्यकता हो सकती है, जिससे भंडार में और कमी आ सकती है। बाजार 5 जून को अपनी अगली मौद्रिक नीति (monetary policy) के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है।
