विदेशी निवेशकों की वापसी: क्या है वजह?
पिछले कुछ महीनों के दौरान लगातार पैसे निकालने के बाद, फरवरी 2026 के पहले हफ्ते में एफपीआई (FPIs) ने भारतीय शेयर बाज़ार का रुख किया है। जनवरी 2026 में जहां ₹35,962 करोड़ का भारी आउटफ्लो (outflow) देखा गया था, वहीं इस बार ₹8,129 करोड़ का शुद्ध इनफ्लो (net inflow) आया है। विदेशी निवेशकों के इस बदलते मिजाज के पीछे कई अहम कारण हैं, जिनमें हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुए एक बड़े ट्रेड एग्रीमेंट (trade agreement) का विशेष योगदान है। इसके अलावा, 1 फरवरी 2026 को पेश हुए यूनियन बजट (Union Budget) ने भी बाज़ार को सहारा दिया है।
यूएस-इंडिया ट्रेड डील और बजट का दम
इस वापसी का सबसे बड़ा ट्रिगर (trigger) भारत और अमेरिका के बीच तय हुआ ट्रेड डील है। इस डील के तहत, भारतीय सामानों पर लगने वाले टैरिफ (tariffs) को 50% तक के उच्च स्तर से घटाकर 18% कर दिया गया है। इससे व्यापारिक तनाव कम हुआ है और विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। साथ ही, भारत द्वारा रशियन ऑयल की खरीद कम करने और अमेरिकी एनर्जी सोर्स की ओर बढ़ने की बात ने भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रेड एनवायरनमेंट (predictable trade environment) बनाया है।
यूनियन बजट 2026-27 ने भी ग्रोथ और फिस्कल प्रूडेंस (fiscal prudence) के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। बजट में सेक्टर-स्पेसिफिक सपोर्ट (sector-specific support) के साथ-साथ फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) को जीडीपी के 4.3% पर रखने का लक्ष्य रखा गया है। इन सकारात्मक खबरों के बीच, 6 फरवरी 2026 तक निफ्टी 50 (Nifty 50) का आरएसआई (RSI) करीब 57.47 के स्तर पर था, जो एक अच्छी मोमेंटम (momentum) का संकेत देता है। हालांकि, इंडिया VIX (India VIX), जो बाज़ार की वोलेटिलिटी (volatility) को मापता है, अभी भी लगभग 15.8 के आसपास बना हुआ है, जो अंदरूनी सावधानी की ओर इशारा करता है।
वैल्यूएशन और रुपी को लेकर चिंताएं
हालांकि, एफपीआई (FPIs) के निवेश की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) कई फैक्टर्स पर टिकी हुई है। सबसे बड़ा सवाल भारत के ऊंचे वैल्यूएशन (high valuations) का है। 6 फरवरी 2026 तक, सेंसेक्स (Sensex) का P/E रेशियो (P/E ratio) लगभग 23.15 था, जो इमर्जिंग मार्केट (Emerging Market) के औसत 12-14x से काफी ज्यादा है। MSCI इंडिया इंडेक्स (MSCI India Index) का फॉरवर्ड P/E (forward P/E) भी 20-22x के आसपास रहा है, जो एक बड़ा वैल्यूएशन गैप (valuation gap) दिखाता है। ऐतिहासिक तौर पर, भारत MSCI इमर्जिंग मार्केट्स की तुलना में 40-60% का प्रीमियम (premium) मांगता रहा है।
इसके अलावा, इंडियन रुपये (Indian Rupee) की स्थिति भी अहम है। डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 90.70 के स्तर पर है, और मार्च 2026 तक इसके 90 से नीचे जाने का अनुमान है, हालांकि कुछ एनालिस्ट (analysts) इसे Q1 2026 में 89.50 तक मजबूत होते भी देख रहे हैं। ग्लोबल मैक्रोइकॉनॉमिक कंडीशंस (Global macroeconomic conditions) भी एक बड़ा जोखिम हैं। बढ़ता हुआ VIX और हाल ही में यूएस टेक स्टॉक्स (US tech stocks) में आई गिरावट वैश्विक अनिश्चितता को दर्शाती है। यूनियन बजट में डेरिवेटिव्स (derivatives) पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) में की गई बढ़ोतरी ने ट्रेडर्स की लागत बढ़ा दी है, जो बाज़ार के लिए एक ओवरहैंग (overhang) का काम कर सकती है।
फॉरेंसिक बियर केस: क्या हैं बड़े जोखिम?
हालिया इनफ्लो (inflow) के बावजूद, एक गहरी नज़र बताती है कि कई बड़े हेडविंड्स (headwinds) मौजूद हैं। सबसे मुख्य चिंता भारत का अत्यधिक ऊंचा वैल्यूएशन (elevated valuations) है। इमर्जिंग मार्केट पीयर्स (Emerging Market peers) की तुलना में काफी प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा भारतीय इक्विटी (equity) महंगा लग रहा है, खासकर तब जब देश AI जैसे बूमिंग सेक्टर (AI sector) में कोई बड़ा प्लेयर नहीं है। 2025 में ₹1.66 लाख करोड़ के भारी आउटफ्लो (outflows) को देखते हुए, विदेशी निवेश की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) पर सवाल उठते हैं। यूएस-इंडिया ट्रेड डील ने सेंटीमेंट (sentiment) को राहत दी है, लेकिन यह तुरंत कई कंपनियों के लिए अर्निंग ग्रोथ (earnings growth) में नहीं बदल सकता। साथ ही, रुपये की अस्थिरता (volatility) विदेशी निवेशकों के रिटर्न के लिए जोखिम पैदा करती है। बढ़ता हुआ VIX वैश्विक अनिश्चितता का संकेत देता है, जो आसानी से एफपीआई (FPI) फ्लो को उलट सकता है। डेरिवेटिव्स पर बढ़ा हुआ STT (Securities Transaction Tax) ट्रेडिंग एक्टिविटी (trading activity) को भी कम करता है।
आगे का आउटलुक
बाज़ार के जानकारों का मानना है कि ट्रेड डील और बजट सकारात्मक रहे हैं, लेकिन एफपीआई (FPIs) से लगातार निवेश के लिए कॉर्पोरेट अर्निंग्स (corporate earnings) में रिकवरी, इकोनॉमिक स्टेबिलिटी (economic stability) और ग्लोबल मैक्रो अनिश्चितताओं का समाधान होना ज़रूरी है। ब्रोकरेज रिपोर्ट्स (Brokerage reports) कहती हैं कि हालांकि मौजूदा सेंटीमेंट पॉजिटिव है, एफपीआई (FPIs) कैपिटल डिसाइसिवली (capital decisively) लगाने से पहले अर्निंग्स, वैल्यूएशन और मैक्रो स्टेबिलिटी पर बारीकी से नज़र रखेंगे।