भारत विदेशी निवेश (FDI) के मामले में दुनिया में 11वें स्थान पर पहुंच गया है। 2025 में देश में आया विदेशी निवेश 44% बढ़कर $39 अरब डॉलर रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में हुई इस ग्रोथ ने भारतीय बाज़ार में बढ़ते भरोसे को दर्शाया है।
भारत बना ग्लोबल निवेशकों की पहली पसंद!
दुनिया भर से आ रहे पैसों के मामले में भारत ने अपनी धाक जमा ली है। हालिया वर्ल्ड इन्वेस्टमेंट रिपोर्ट के अनुसार, भारत विदेशी सीधा निवेश (FDI) पाने वाले देशों में 11वें नंबर पर आ गया है। 2025 में देश में विदेशी निवेश में 44% की भारी बढ़ोतरी हुई, जो कि कुल $39 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह दिखाता है कि कैसे भारतीय बाज़ार अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को लुभा रहा है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव और इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में।
निवेश बढ़ने की क्या हैं वजहें?
इस शानदार प्रदर्शन के पीछे कई बड़े कारण हैं, जैसे भारत का बड़ा बाज़ार, डिजिटल मांग में तेज़ी और टैलेंटेड वर्कफ़ोर्स। सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी पहलों ने घरेलू और विदेशी कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने या उनका विस्तार करने के लिए खूब प्रोत्साहित किया है। Alphabet का डेटा सेंटर में $14.5 अरब का निवेश और पोलैंड की Hynfra द्वारा $4.1 अरब का रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट, ये सब हाल के दिनों में बड़े निवेशों की ओर इशारा करते हैं।
भारतीय कंपनियों का बढ़ता ग्लोबल दबदबा
सिर्फ विदेशी पैसा ही नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियां भी दुनिया भर में अपना दबदबा बढ़ा रही हैं। 2025 में, भारत विदेशी निवेश भेजने के मामले में दो पायदान ऊपर चढ़कर 18वें स्थान पर पहुंच गया। देश से बाहर जाने वाले निवेश में 50% का उछाल आया और यह $36 अरब डॉलर रहा। इसका मतलब है कि भारतीय कंपनियां अब ग्लोबल मार्केट्स में ज़्यादा एक्टिव हो रही हैं और विदेशी कंपनियों को खरीदने या वहां अपनी यूनिट्स लगाने के ज़रिए ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बन रही हैं।
आगे का रास्ता: जोखिम और उम्मीदें
हालांकि, यह तेज़ी ज़रूर उत्साहजनक है, लेकिन रिपोर्ट में कुछ ऐसी बातों का भी ज़िक्र है जो भविष्य में निवेश पर असर डाल सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय टैरिफ को लेकर अनिश्चितता, ग्लोबल सप्लाई चेन में चल रहे बदलाव और दुनिया भर में निवेश के प्रति थोड़ी नरमी, ये सब नए मैन्युफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की रफ़्तार को धीमा कर सकते हैं। निवेशकों को इन ग्लोबल फैक्टर्स पर नज़र रखनी होगी कि वे स्थानीय नीतियों के साथ कैसे जुड़ते हैं। साथ ही, अमेरिका, EU, साउथ कोरिया और जापान जैसे देशों से भारत में निवेश आ रहा है, लेकिन यह कब तक जारी रहेगा, यह बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के समय पर पूरे होने और मैन्युफैक्चरिंग के लिए कॉम्पिटिटिव माहौल बनाए रखने पर निर्भर करेगा।
