साल 2025 में भारत में विदेशी सीधा निवेश (FDI) **43.6%** बढ़कर **$38.89 बिलियन** तक पहुंच गया, जिससे देश दुनिया में 11वें स्थान पर आ गया। लेकिन, नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं **$111 बिलियन** से घटकर **$74 बिलियन** रह गईं, खासकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रुचि कम होने से। यह बदलाव कैपिटल-इंटेंसिव डिजिटल सेक्टर्स की ओर इशारा करता है, जो भविष्य में रोज़गार सृजन के लिए चुनौतियां पेश कर सकता है।
भारत में FDI में शानदार उछाल, पर चिंता की वजह?
साल 2025 में भारत ने विदेशी सीधा निवेश (FDI) के मामले में दमदार प्रदर्शन किया है। UNCTAD वर्ल्ड इन्वेस्टमेंट रिपोर्ट के अनुसार, देश में FDI इनफ्लो 43.6% बढ़कर $38.89 बिलियन पर पहुंच गया। इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी सरकारी पहलों ने भारत को दुनिया के टॉप FDI डेस्टिनेशन में बनाए रखने में मदद की है, भले ही ग्लोबल इकोनॉमी में अनिश्चितता बनी हुई है।
ग्रीनफील्ड निवेश में गिरावट
कुल FDI के आंकड़े भले ही सकारात्मक दिख रहे हों, लेकिन आने वाले कैपिटल की प्रकृति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नए ग्रीनफील्ड इन्वेस्टमेंट (नए प्रोजेक्ट्स) की घोषणाएं 2024 के $111 बिलियन के मुकाबले 2025 में घटकर $74 बिलियन रह गईं। यह गिरावट मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में सबसे ज़्यादा दिखी, जहाँ घोषित निवेश $65 बिलियन से गिरकर लगभग $27 बिलियन हो गया। निवेशकों के लिए, मैन्युफैक्चरिंग में यह नरमी बड़े औद्योगिक एसेट्स के निर्माण में संभावित मंदी का संकेत देती है।
डिजिटल की ओर झुकाव और रोज़गार का सवाल
कैपिटल फ्लो अब लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग की बजाय इंफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी (ICT) सेक्टर की ओर बढ़ रहा है। इसका एक बड़ा उदाहरण Alphabet का $14.5 बिलियन का डेटा सेंटर निवेश है, जो इस साल एशिया के विकासशील देशों में सबसे बड़ा ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट था। ये डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स देश की तकनीकी क्षमता तो बढ़ाते हैं, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स की तुलना में अक्सर कम कर्मचारियों की ज़रूरत होती है। यह ट्रेंड भारत के लिए एक लंबी अवधि की चुनौती पेश करता है, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग अभी भी देश के युवा कार्यबल के लिए रोज़गार पैदा करने का एक महत्वपूर्ण इंजन है।
प्रतिस्पर्धा और आउटफ्लो का दबाव
भारत एक बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय माहौल का भी सामना कर रहा है। दक्षिण पूर्व एशियाई देश, जैसे मलेशिया और थाईलैंड, ने मजबूत FDI ग्रोथ दर्ज की है। यह उन कंपनियों के लिए एक चुनौती पेश करता है जो 'चाइना+1' रणनीति के तहत सप्लाई चेन में विविधता लाना चाहती हैं। इसके अलावा, भारतीय कंपनियां भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति बढ़ा रही हैं, जिसके चलते 2025 में FDI आउटफ्लो 47% बढ़कर $35.7 बिलियन हो गया। यह आउटफ्लो कंपनियों को वैश्विक स्तर पर विस्तार करने और करेंसी को सपोर्ट करने में मदद करता है, लेकिन आने वाले कैपिटल के नेट कुशन को भी कम करता है। निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या भविष्य की औद्योगिक नीतियां हाई-टेक डिजिटल निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में व्यापक, लेबर-इंटेंसिव ग्रोथ की ज़रूरत के बीच के अंतर को प्रभावी ढंग से पाट पाएंगी।
