आर्थिक सुधारों का डबल अटैक!
भारत सरकार ट्रेड और टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन में एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसका मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट करना और एक्सपोर्ट्स को ग्लोबल मार्केट में बढ़ाना है। रेवेन्यू सेक्रेटरी अरविंद श्रीवास्तव ने साफ किया है कि कस्टम्स का 'सत्तावादी और विरोधी' रवैया अब 'हितधारकों पर भरोसा' और 'टेक्नोलॉजी के प्रभावी इस्तेमाल' पर आधारित होगा। यह बदलाव यूनियन बजट का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य कस्टम्स को सिर्फ एक रेगुलेटर से आगे बढ़ाकर आर्थिक विकास का 'इनेबलर' बनाना है। इससे भारतीय निर्यातकों को ग्लोबल मार्केट तक पहुंच आसान और तेज मिलेगी।
इस पहल के साथ-साथ, नया इनकम टैक्स एक्ट, 2025, 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाला है। यह दशकों पुराने इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की जगह लेगा। इस नए एक्ट को सरल भाषा, कम अस्पष्टता और बेहतर अनुपालन के साथ डिजाइन किया गया है, और यह रेवेन्यू के लिहाज से न्यूट्रल रहेगा। ट्रेड प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और टैक्स फ्रेमवर्क को आधुनिक बनाने पर यह दोहरा फोकस 'विकसित भारत 2047' के राष्ट्रीय लक्ष्य को दर्शाता है।
ग्लोबल ट्रेड की चुनौतियां
घरेलू स्तर पर उठाए जा रहे इन कदमों के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय ट्रेड का माहौल काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) का अनुमान है कि 2025 में ग्लोबल ट्रेड में मामूली गिरावट आ सकती है, जिसकी वजह बढ़ते टैरिफ और आर्थिक अनिश्चितताएं हैं।
भारत के निर्यात में मजबूती दिखी है, जो अप्रैल-नवंबर 2025 में 5.5% बढ़कर 560 अरब डॉलर से ज्यादा रहा। इसमें इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे सेक्टर का अहम योगदान रहा। हालांकि, जनवरी 2026 में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 34.68 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो आयात में आई बड़ी बढ़ोतरी के कारण हुआ। इसके अलावा, हाल ही में अमेरिका द्वारा 24 फरवरी, 2026 से लागू किए गए 10% के ग्लोबल टैरिफ से लागत बढ़ने और कॉम्पिटिटिवनेस पर असर पड़ने की आशंका है। इस वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए भारतीय निर्यातकों को अपनी स्ट्रेटेजी पर फिर से विचार करना पड़ रहा है।
कस्टम्स की ऑपरेशनल हकीकत
ट्रेड फैसिलिटेशन में भारत ने काफी प्रगति की है। UN ग्लोबल सर्वे ऑन डिजिटल एंड सस्टेनेबल ट्रेड फैसिलिटेशन में 2023 में भारत का स्कोर 93.55% रहा, जिसमें ट्रांसपेरेंसी और पेपरलेस ट्रेड में परफेक्ट स्कोर मिला। लॉजिस्टिक्स परफॉरमेंस इंडेक्स में भी भारत 139 देशों में से 6 स्थान सुधरकर 38वें स्थान पर पहुंच गया। ये सुधार रिस्क मैनेजमेंट सिस्टम (RMS) और ICEGATE जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की बदौलत हुए हैं।
हालांकि, ऑपरेशनल दिक्कतें अभी भी बनी हुई हैं। कस्टम्स क्लीयरेंस में देरी, एडमिनिस्ट्रेटिव अड़चनें और भ्रष्टाचार की संभावना जैसी समस्याएं एक्सपोर्टर्स के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। ICEGATE और ICES जैसे मौजूदा सिस्टम अक्सर अलग-अलग काम करते हैं, जिससे डेटा फ्लो में बाधा आती है। तेज कार्गो क्लीयरेंस अभी भी एक बड़ी चुनौती है। फिजिकल इंस्पेक्शन और रेगुलेटरी रुकावटें देरी बढ़ाती हैं, जिससे लागत बढ़ती है और ट्रेडर्स के लिए अनिश्चितता पैदा होती है। सिंगापुर जैसे देशों के मुकाबले, जहां कार्गो क्लीयरेंस काफी तेजी से होता है, भारत की कस्टम्स प्रक्रियाओं में अभी काफी सुधार की गुंजाइश है।
सुधारों पर मंडराते खतरे
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने के इरादे नेक हैं, लेकिन कस्टम्स सुधारों के तुरंत असर पर कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। लगातार बनी हुई ऑपरेशनल इनएफिशिएंसी, देरी और भ्रष्टाचार की आशंका एक्सपोर्टर की कॉम्पिटिटिवनेस के लिए बड़ा खतरा हैं। ट्रेड फैसिलिटेशन स्कोर में सुधार के बावजूद, हाई मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) टैरिफ और प्रमुख ट्रेड एग्रीमेंट्स से बाहर होना भारत की ग्लोबल ट्रेड पॉलिसी कॉम्पिटिटिवनेस को प्रभावित करता है।
इसके अलावा, हाल ही में Remission of Duties and Taxes on Exported Products (RoDTEP) स्कीम के तहत एक्सपोर्ट ड्यूटी बेनिफिट्स को आधा करने का फैसला, सरकार पर बढ़ते राजकोषीय दबाव की ओर इशारा करता है। यह उन एक्सपोर्टर्स के लिए चिंता का विषय है जो पहले से ही मुश्किल वैश्विक आर्थिक माहौल का सामना कर रहे हैं। नया इनकम टैक्स एक्ट सरलीकरण का वादा करता है, लेकिन इसके ट्रांजिशन पीरियड और संभावित अप्रत्याशित व्याख्याओं से व्यवसायों के लिए अनुपालन संबंधी जटिलताएं बढ़ सकती हैं। सरकार की सुधारों की महत्वाकांक्षी योजना को जमीनी हकीकत में प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी चुनौती है।
आगे का रास्ता
भविष्य को देखते हुए, भारत की आर्थिक रणनीति उसकी बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और एक्सपोर्ट बाजारों के विस्तार पर टिकी है। फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI), खासकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में, आने का अनुमान है और घरेलू अर्थव्यवस्था में भी ग्रोथ जारी रहने की उम्मीद है। 'मेक इन इंडिया फॉर द वर्ल्ड' पहल इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे प्रमुख सेक्टरों में ग्रोथ को बढ़ावा दे रही है।
वर्तमान कस्टम्स और टैक्स सुधारों की सफलता, इन घरेलू ताकतों को ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस में बदलने के लिए महत्वपूर्ण होगी। 2030 तक लॉजिस्टिक्स में टॉप 25 देशों में शामिल होने और लॉजिस्टिक्स लागत को GDP के 10% से नीचे लाने जैसे लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कस्टम्स और ट्रेड इंफ्रास्ट्रक्चर में ऑपरेशनल एफिशिएंसी और टेक्नोलॉजी इंटीग्रेशन पर लगातार फोकस करना होगा। आने वाले बजट चक्रों में रेवेन्यू जनरेशन और ट्रेड फैसिलिटेशन के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से टैरिफ स्ट्रक्चर और प्रोसीजरल सरलीकरण में और सुधार देखे जा सकते हैं।