भारत का 'विकसित भारत' मिशन: इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगा बूस्ट? ब्राज़ील के टैक्स-फ्री बॉन्ड मॉडल से प्रेरणा

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत का 'विकसित भारत' मिशन: इंफ्रास्ट्रक्चर को मिलेगा बूस्ट? ब्राज़ील के टैक्स-फ्री बॉन्ड मॉडल से प्रेरणा
Overview

'विकसित भारत' के इंफ्रास्ट्रक्चर लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारत एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। सरकार ब्राज़ील के उस मॉडल पर विचार कर रही है जहाँ टैक्स-फ्री बॉन्ड्स के ज़रिए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए भारी भरकम फंड जुटाया जाता है। इसका मकसद रिटेल इन्वेस्टर्स को इक्विटी से निकालकर बॉन्ड मार्केट की ओर लाना है, जिससे इकोनॉमी को **0.3-0.4%** तक का बूस्ट मिलने की उम्मीद है। हालांकि, भारत के बॉन्ड मार्केट की अपनी राह में कई रुकावटें भी हैं।

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भारत के 'विकसित भारत' के सपने को साकार करने के लिए बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण ज़रूरी है। इसके लिए देश की फाइनेंसियल सिस्टम में बदलाव लाना होगा ताकि बॉन्ड मार्केट मजबूत और ज़्यादा विविध बने। फिलहाल, ज़्यादातर रिटेल इन्वेस्टर स्टॉक मार्केट को तरजीह देते हैं, जो उन्हें ग्लोबल घटनाओं के जोखिम में डालता है। इसके विपरीत, बॉन्ड्स की ओर बचत को मोड़ने से कम अस्थिरता और ज़्यादा स्थिर रिटर्न मिल सकता है, खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए जो अच्छा प्रदर्शन दिखा रहा है।

ब्राज़ील रिटेल इन्वेस्टमेंट को बॉन्ड्स में लाने का एक सफल उदाहरण पेश करता है। साल 2011 से, ब्राज़ील इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए टैक्स-फ्री 'इंसेटिवाइज्ड डिबेंचर्स' का इस्तेमाल कर रहा है। इस मॉडल ने रिटेल सेविंग्स को बड़ी मात्रा में आकर्षित किया है, अकेले 2024 में ही BRL 133.5 बिलियन (लगभग USD 24 बिलियन) के ऐसे बॉन्ड्स जारी किए गए। ये बॉन्ड्स प्राइवेट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंडिंग का एक मुख्य जरिया बन गए हैं, जिन्होंने पारंपरिक बैंक लोन को भी पीछे छोड़ दिया है। इस मॉडल की ख़ासियत है कि यह निवेशकों को टैक्स बेनेफिट्स देता है, जिससे ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग कॉस्ट कम हो जाती है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर भारत में रिटेल सेविंग्स का एक छोटा हिस्सा भी (इक्विटी SIP इनफ्लो का 10%) बॉन्ड मार्केट की ओर मोड़ा जाए, तो इकोनॉमी को बड़ा फायदा हो सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ने से यह बदलाव जीडीपी को 0.3-0.4% तक बढ़ा सकता है। टैक्स छूट की लागत भी ज़्यादा नहीं होगी। उम्मीद है कि इंफ्रास्ट्रक्चर से मिलने वाला अतिरिक्त जीडीपी, बॉन्ड इंटरेस्ट से होने वाली टैक्स छूट के मुकाबले करीब 0.05% जीडीपी के बराबर टैक्स जुटाएगा, जबकि टैक्स छूट का खर्च करीब 0.02% जीडीपी के बराबर होगा। यह कुछ हद तक भारत की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसा है, जहाँ स्ट्रैटेजिक टैक्स छूट ने इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मा जैसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स को बढ़ाया।

हालांकि, भारत के बॉन्ड मार्केट में कुछ बड़ी स्ट्रक्चरल समस्याएं भी हैं जो ब्राज़ील जैसे मॉडल को अपनाने में बाधा डाल सकती हैं। कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी छोटा है और इसमें ज़्यादातर इंस्टीट्यूशंस का दबदबा है, रिटेल इन्वेस्टर्स की सीधी भागीदारी बहुत कम है। लिक्विडिटी की कमी और कुछ बॉन्ड्स पर कीमतों में बड़े अंतर रिटेल इन्वेस्टर्स के मुनाफे को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, बॉन्ड्स स्टॉक की तुलना में ज़्यादा जटिल होते हैं, और कई रिटेल इन्वेस्टर इन्हें समझने में सक्षम नहीं हो सकते। भारत का डेट-टू-जीडीपी रेशियो भी ज़्यादा है (फिलहाल करीब 82%, 2026 तक 83% से ऊपर जाने का अनुमान), ऐसे में नए स्कीम्स पर विचार करते समय फिस्कल सावधानी बरतना ज़रूरी है।

भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग गैप (जीडीपी का 5% से ज़्यादा) को भरने के लिए, ज़्यादा प्राइवेट सेक्टर इन्वेस्टमेंट और एक गहरे बॉन्ड मार्केट की ज़रूरत है। NaBFID जैसे संस्थान बॉन्ड मार्केट को बढ़ावा देने और लॉन्ग-टर्म कैपिटल आकर्षित करने के लिए काम कर रहे हैं। ब्राज़ील के टैक्स इंसेंटिव्स को अपनाकर और PLI स्कीम की सफलताओं से सीख लेकर, भारत एक ज़्यादा संतुलित फाइनेंसियल सिस्टम बना सकता है। यह सिस्टम 'विकसित भारत' के विजन को बेहतर ढंग से फंड कर पाएगा, जिससे राष्ट्र निर्माण का प्रयास और व्यापक होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.