भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाली ज़रूरी मशीनरी और कंपोनेंट्स पर कस्टम ड्यूटी में छूट को मार्च 2029 तक बढ़ा दिया है। इस कदम का मकसद एडवांस इक्विपमेंट के इम्पोर्ट को सस्ता बनाना है, ताकि कंपनियां सिर्फ असेंबलिंग से आगे बढ़कर डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
मेक इन इंडिया को बढ़ावा
भारतीय सरकार ने 31 मार्च 2029 तक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में इस्तेमाल होने वाली मशीनों और कंपोनेंट्स पर कस्टम ड्यूटी में छूट जारी रखने का फैसला किया है। इस पॉलिसी अपडेट का सीधा मकसद यह है कि जो स्पेशल कैपिटल इक्विपमेंट अभी भारत में नहीं बन रहे हैं, उन्हें लोकल कंपनियां कम दाम पर इम्पोर्ट कर सकें। सरकार का इरादा है कि इससे इंडस्ट्री केवल प्रोडक्ट असेंबलिंग तक सीमित न रहकर, ज़्यादा कॉम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं की ओर बढ़े।
वैल्यू एडिशन पर खास फोकस
फिलहाल, इंडियन इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन का स्तर काफी कम है, जो करीब 18% से 20% के आसपास है। इसे बढ़ाने के लिए, नई पॉलिसी ज़रूरी पार्ट्स की सप्लाई चेन को लोकलाइज करने पर ज़ोर देती है। इसमें लिथियम-आयन बैटरी और स्पेशलाइज्ड डिस्प्ले मॉड्यूल के प्रोडक्शन के लिए सपोर्ट बढ़ाना भी शामिल है। यह कदम प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम जैसी मौजूदा सरकारी योजनाओं का पूरक होगा। इन स्कीम्स में शामिल कंपनियों को नई मैन्युफैक्चरिंग लाइन्स लगाते समय लागत में कमी का फायदा मिल सकता है।
कंपोनेंट्स और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग पर असर
इस छूट की अवधि बढ़ने से एलिजिबल इक्विपमेंट का दायरा काफी बढ़ गया है। खासकर लिथियम-आयन बैटरी मैन्युफैक्चरिंग के लिए, कंसेशनल ड्यूटी के तहत कवर की जाने वाली मशीनरी की कैटेगरी 85 तक पहुंच गई हैं। इसमें मटेरियल मिक्सिंग से लेकर फाइनल पैकेजिंग तक, प्रोडक्शन के कई स्टेज शामिल हैं। पॉलिसी ऑटोमोटिव और इंडस्ट्रियल एप्लीकेशन्स में इस्तेमाल होने वाले डिस्प्ले असेंबली कंपोनेंट्स के लिए तो सपोर्ट देती है, लेकिन यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच या टीवी के डिस्प्ले असेंबली पर यह छूट लागू नहीं होगी। इसके अलावा, सरकार ने मोबाइल फोन वायरलेस चार्जिंग मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले छह खास कंपोनेंट्स को भी ड्यूटी कंसेशन के दायरे में शामिल किया है।
सेक्टर की ग्रोथ और चुनौतियां
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। 2024-25 में यह करीब ₹12 लाख करोड़ तक पहुंच गया, जो 2014-15 में लगभग ₹1.9 लाख करोड़ था। दुनिया के दूसरे सबसे बड़े मोबाइल फोन निर्माता के तौर पर अपनी पहचान बनाने के साथ, अब फोकस इस ग्रोथ को बनाए रखने पर है। हालांकि, सेक्टर को इंफ्रास्ट्रक्चर, रॉ मटेरियल की उपलब्धता और अन्य देशों के स्थापित मैन्युफैक्चरिंग हब से कॉम्पिटिशन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक्सपैंड करने की चाह रखने वाली कंपनियों के लिए इम्पोर्टेड हाई-एंड मशीनरी पर निर्भरता एक बड़ी कॉस्ट बनी हुई है।
निवेशक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विस प्रोवाइडर्स और कंपोनेंट मेकर्स द्वारा अनाउंस किए गए नए प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन पर नज़र रख सकते हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ये ड्यूटी राहत उपाय कैपेसिटी एक्सपेंशन या ऑपरेटिंग मार्जिन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इसका अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां इन कंपोनेंट्स और मशीनरी को अपने मौजूदा प्रोडक्शन वर्कफ्लो में कितनी सफलतापूर्वक इंटीग्रेट कर पाती हैं और ज़्यादा डोमेस्टिक स्केल हासिल कर पाती हैं।
