साल 2026 के जून महीने में भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट (Merchandise Exports) में **15.5%** का ज़बरदस्त उछाल आया और यह **$40.41 अरब** तक पहुंच गया। हालांकि, इस दौरान इंपोर्ट (Imports) में **31%** की भारी बढ़ोतरी देखी गई, जिसके चलते ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) पांच महीने के उच्चतम स्तर **$30.43 अरब** पर पहुंच गया। यह बढ़त डोमेस्टिक डिमांड (Domestic Demand) में तेज़ी और कमोडिटी की ऊंची कीमतों का नतीजा है।
एक्सपोर्ट की कहानी, इंपोर्ट का दर्द
जून 2026 के लिए भारत के विदेशी व्यापार के आंकड़े एक मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं। एक तरफ जहां एक्सपोर्ट में अच्छी खासी तेज़ी देखने को मिली, वहीं दूसरी तरफ इंपोर्ट बिल में भी भारी इज़ाफ़ा हुआ है। मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट साल-दर-साल 15.5% बढ़कर $40.41 अरब पर पहुंच गया। इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और एग्री प्रोडक्ट्स की लगातार डिमांड ने इस ग्रोथ को सहारा दिया। खास तौर पर इंजीनियरिंग गुड्स, जो एक्सपोर्ट बास्केट का एक अहम हिस्सा हैं, में 20.74% की बढ़त के साथ $11.47 अरब का आंकड़ा छुआ। चावल, लौह अयस्क और समुद्री उत्पादों जैसे दूसरे सेक्टर्स ने भी एक्सपोर्ट की इस रफ्तार में योगदान दिया।
इंपोर्ट में उछाल ने बढ़ाई चिंता
महीने के लिए ट्रेड डेफिसिट बढ़कर $30.43 अरब हो गया, जो पिछले पांच महीनों का सबसे बड़ा आंकड़ा है। कुल इंपोर्ट $70.84 अरब पर पहुंच गया, जो पिछले साल की तुलना में 31% ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कच्चे तेल के इंपोर्ट में 40% की भारी बढ़ोतरी हुई और यह $19.32 अरब तक पहुंच गया। इलेक्ट्रॉनिक्स के इंपोर्ट में भी ज़बरदस्त तेज़ी देखी गई, जो 58.77% बढ़कर $13.36 अरब हो गया। इसके अलावा, सोने, केमिकल्स और फर्टिलाइजर्स की बढ़ी हुई खरीद ने भी इंपोर्ट पर दबाव बढ़ाया।
तिमाही प्रदर्शन
चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में, भारत के कुल मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट में 15.92% की बढ़त दर्ज हुई और यह $129.32 अरब पर पहुंच गया। इसी अवधि में, इंपोर्ट 19.89% बढ़कर $216.18 अरब रहा। इसके चलते, तिमाही के लिए कुल ट्रेड डेफिसिट $86.86 अरब रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के $68.75 अरब की तुलना में ज़्यादा है। भले ही तिमाही एक्सपोर्ट वैल्यू रिकॉर्ड ऊंचाई पर है, लेकिन इंपोर्ट की तेज़ ग्रोथ मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
बाज़ार और सेक्टर का विश्लेषण
प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में एक्सपोर्ट के रुझान अलग-अलग रहे। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट पार्टनर बना हुआ है, हालांकि जून में वहां एक्सपोर्ट 1.21% घटकर $8.17 अरब रहा। वहीं, अमेरिका से इंपोर्ट में 33.86% की भारी बढ़ोतरी हुई। पश्चिमी एशियाई देशों को एक्सपोर्ट, जहां तिमाही की शुरुआत में क्षेत्रीय तनाव के कारण थोड़ी बाधा आई थी, जून में 7.29% की ईयर-ऑन-ईयर ग्रोथ के साथ रिकवरी दिखाते नज़र आए। सिंगापुर, चीन और मलेशिया सहित अन्य देशों के साथ भी व्यापार में सकारात्मक गति देखी गई।
निवेशकों के लिए, बढ़ता हुआ ट्रेड डेफिसिट यह बताता है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट सेक्टर भले ही मज़बूती दिखा रहा हो, लेकिन इंपोर्टेड ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स पर निर्भरता राष्ट्रीय करंट अकाउंट को प्रभावित कर रही है। आगे चलकर, कमोडिटी की कीमतों, खासकर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले मासिक उतार-चढ़ाव पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा, और देखना होगा कि इन वैश्विक कीमतों का डोमेस्टिक इन्फ्लेशनरी प्रेशर (inflationary pressure) और इंपोर्ट-हैवी इंडस्ट्रीज के मार्जिन्स पर क्या असर पड़ता है।
