रिकॉर्ड एक्सपोर्ट्स, पर 'प्राइस' का भारी बोझ
फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में भारत का एक्सपोर्ट $824.9 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले साल से 6.01% ज्यादा है। इसमें सर्विस एक्सपोर्ट (Service Exports) का योगदान खास रहा, जो 13.6% बढ़कर $387.5 अरब तक पहुंच गया। यह नंबर्स ग्लोबल इकोनॉमी के बदलते माहौल में भारतीय ट्रेड की मजबूती को दिखाते हैं।
एक्सपोर्ट्स की असली कहानी: वैल्यू की जगह कीमत पर जोर
लेकिन इन शानदार आंकड़ों के पीछे एक बड़ी चिंता छिपी है। भारतीय एक्सपोर्ट सेक्टर अपनी वैल्यू बढ़ाने (Value Creation) के बजाय, केवल कीमत (Cost Competitiveness) के दम पर आगे बढ़ रहा है। यह रणनीति लंबी अवधि में प्रॉफिटेबिलिटी और ब्रांड वैल्यू को सीमित कर सकती है।
'क्वालिटी' पर सरकार का फोकस और एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन
इस स्थिति को समझते हुए, नीति आयोग (NITI Aayog) के वाइस चेयरमैन सुमन बेरी ने कहा था कि 'हम तभी एक्सपोर्ट में सफल हो सकते हैं जब हम क्वालिटी प्रोडक्शन में सफल हों।' इसी सोच के साथ सरकार एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (Export Promotion Mission) चला रही है, जिसके तहत ₹25,060 करोड़ का बजट क्वालिटी, ब्रांडिंग और MSMEs को बढ़ावा देने के लिए रखा गया है।
R&D में बड़ी खाई और इनोवेशन की कमी
इस क्वालिटी शिफ्ट की राह में सबसे बड़ी बाधा रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) में भारत का कम निवेश है। जहां दुनिया के बड़े देश अपने GDP का औसतन 3.23% R&D पर खर्च करते हैं, वहीं भारत का खर्च सिर्फ 0.64% है। चीन 2.4% और अमेरिका 3.47% खर्च कर रहे हैं। भारत का प्राइवेट सेक्टर भी R&D में खास योगदान नहीं दे रहा, कुल खर्च का सिर्फ 36.4% ही प्राइवेट सेक्टर से आता है। टॉप इंडियन फर्म्स नेट सेल्स का 1% से भी कम R&D पर हर साल खर्च करती हैं। इस कमी के चलते हम ऐसे यूनीक, हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स नहीं बना पा रहे जो प्रीमियम कीमत दिला सकें।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की स्थिति और PMI
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी अच्छी ग्रोथ (FY25 के लिए 9.3% का अनुमान) दिख रही है, लेकिन इसका इकोनॉमी में शेयर अभी भी कम है। इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कुछ सेक्टर्स में तेजी देखी जा रही है। असली चुनौती बेसिक मैन्युफैक्चरिंग से आगे बढ़कर वैल्यू-एडेड प्रोडक्शन की है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग PMI लगातार 5 साल से 50 के ऊपर बना हुआ है, जो विस्तार (Expansion) का संकेत है, लेकिन इनपुट कॉस्ट का दबाव और धीमी डिमांड ग्रोथ इसे धीमा कर रही है।
मैक्रो इकोनॉमिक चुनौतियां और लागत का बढ़ना
मैन्युफैक्चरिंग गुड्स में महंगाई (Inflation) का दबाव भी लागत (Cost) बढ़ा रहा है। फरवरी 2025 में होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) 2.86% पर था। कच्चे माल, एनर्जी और ट्रांसपोर्ट की बढ़ती कीमतें भी मार्जिन पर असर डाल रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) और करेंसी रिस्क भी चिंताएं बढ़ा रहे हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भी तेल की बढ़ती कीमतों और करेंसी की अस्थिरता के कारण भारत की GDP ग्रोथ को लेकर थोड़ी नरमी का अनुमान लगाया है। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए क्वालिटी अपग्रेड और इनोवेशन पर खर्च का बोझ उठाना और मुश्किल हो जाता है।
वैल्यू-ड्रिवन एक्सपोर्ट्स की राह में चुनौतियां
कीमत-आधारित (Price-driven) एक्सपोर्ट से वैल्यू-आधारित (Value-driven) एक्सपोर्ट की ओर यह बदलाव आसान नहीं है। इसके लिए R&D, एडवांस मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी सर्टिफिकेशन में भारी निवेश की जरूरत होगी, जो छोटी और मध्यम अवधि में प्रॉफिट घटा सकता है। लाखों MSMEs के लिए वर्ल्ड-क्लास स्टैंडर्ड्स को पूरा करना, बिना कीमत बढ़ाए, एक बड़ी चुनौती है। मौजूदा ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स के पास दशकों का ब्रांड इक्विटी और क्वालिटी कल्चर है, जिसे पॉलिसी से तुरंत बदलना मुश्किल है। भारत के विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस को देखते हुए, नए स्टैंडर्ड्स को अपनाना धीरे-धीरे और असमान रूप से होगा, जिससे जल्दी अपनाने वालों और कीमत पर प्रतिस्पर्धा करने वालों के बीच एक अंतर बन जाएगा।
आगे का रास्ता: क्वालिटी लीडरशिप की ओर
एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन और सरकारी नीतियां एक सपोर्टिव माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग में ग्लोबल लीडर बनना एक लंबी यात्रा है। एनालिस्ट्स भारत की GDP ग्रोथ को लेकर पॉजिटिव हैं, गोल्डमैन सैक्स ने 2026 के लिए 6.9% का अनुमान लगाया है, पर बाहरी झटके इसे प्रभावित कर सकते हैं। सफलता लंबे समय तक इनोवेशन में निवेश, प्राइवेट सेक्टर की R&D के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता और भारतीय मैन्युफैक्चरर्स द्वारा ग्लोबल खरीदारों को बेहतर वैल्यू दिखाने पर निर्भर करेगी। सिर्फ कम लागत वाले सप्लायर की पहचान से हटकर ग्लोबल पार्टनर्स बनना, स्ट्रैटेजी में एक बड़ा बदलाव और उत्कृष्टता के प्रति स्थायी प्रतिबद्धता की मांग करता है।
