भारत का एक्सपोर्ट (निर्यात) अब पश्चिमी देशों से हटकर ASEAN, अफ्रीका और दक्षिण एशिया की ओर बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में इन क्षेत्रों में शिपमेंट में शानदार बढ़ोतरी देखी गई है, जिससे उत्तरी अमेरिका और यूरोप जैसे धीमे बढ़ते बाजारों पर निर्भरता कम हुई है। कुल निर्यात **$232.73 बिलियन** रहा, हालांकि **$37.42 बिलियन** का व्यापार घाटा अभी भी चिंता का विषय है।
निर्यात में बड़ा बदलाव
भारत के व्यापार में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। ASEAN, अफ्रीका और दक्षिण एशिया जैसे उभरते बाजारों में भारतीय शिपमेंट की ग्रोथ, पश्चिमी देशों के मुकाबले काफी तेज हो गई है। वित्त वर्ष 2027 के अप्रैल-मई के आंकड़ों के मुताबिक, ASEAN देशों को निर्यात में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 66.9% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, अफ्रीका को निर्यात 53.1% और दक्षिण एशिया को 40.2% बढ़ा है।
एक्सपोर्ट रणनीति में बदलाव
यह ट्रेंड भारत की एक्सपोर्ट रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। इन तीन क्षेत्रों ने मिलकर भारत के एक्सपोर्ट रेवेन्यू में सालाना $7.6 बिलियन से ज्यादा का इजाफा किया है। फिलहाल, उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बाहर के बाजार भारत के कुल एक्सपोर्ट पोर्टफोलियो का 50% से अधिक हिस्सा रखते हैं। यह पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में धीमी मांग के मुकाबले एक सुरक्षा कवच प्रदान करता है। कुल मिलाकर, अप्रैल-जून तिमाही में भारत के माल और सेवाओं के निर्यात में 11.37% की वृद्धि हुई और यह $232.73 बिलियन तक पहुंच गया।
प्रमुख ग्रोथ इंजन
कुछ देशों ने खास तौर पर ग्रोथ को लीड किया है। तंजानिया में भारतीय सामानों की मांग 146.9% बढ़ी, जबकि श्रीलंका में 124.6%, सिंगापुर में 101.2% और दक्षिण अफ्रीका में 76.5% का इजाफा हुआ। इसके विपरीत, पुराने व्यापारिक साझेदारों से मांग धीमी रही। यूरोप को निर्यात में केवल 4% और उत्तरी अमेरिका में 2.6% की वृद्धि हुई। चीन को निर्यात में 27.54% की वृद्धि देखी गई, जो मजबूत क्षेत्रीय व्यापार गतिविधि को दर्शाता है।
व्यापार घाटा और आयात
उभरते बाजारों में निर्यात की यह ग्रोथ सकारात्मक है, लेकिन कुल व्यापार संतुलन आयात लागतों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। भारत ने अप्रैल-जून तिमाही में $37.42 बिलियन का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) दर्ज किया है। यह घाटा मुख्य रूप से पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक सामानों और रत्नों व आभूषणों की भारी मांग के कारण है। खासकर, पहली तिमाही में चीन से आयात $38.04 बिलियन रहा, जो इलेक्ट्रॉनिक्स की घरेलू जरूरत से प्रेरित था।
आगे की राह
भविष्य को देखते हुए, भारत अमेरिका के साथ एक संभावित व्यापार समझौते पर चर्चा करके अपने व्यापारिक संबंधों को संतुलित कर रहा है। साथ ही, ऊर्जा आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति के तहत अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ा रहा है। निवेशकों और बाजार पर्यवेक्षकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या गैर-पश्चिमी बाजारों में यह ग्रोथ इतनी टिकाऊ रह पाती है कि यह लगातार बने रहने वाले व्यापार घाटे की भरपाई कर सके और बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक व ऊर्जा आयात की लागतों को प्रबंधित कर सके।
