निर्यात की रफ्तार और घरेलू मांग का धीमापन: एक मिली-जुली तस्वीर
अप्रैल के आंकड़े भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक मिली-जुली तस्वीर पेश करते हैं। जहाँ एक ओर मजबूत एक्सपोर्ट ऑर्डर्स ने सेक्टर की ग्रोथ को सहारा दिया, वहीं दूसरी ओर घरेलू मांग में सुस्ती और लागतों में भारी बढ़त जैसी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। HSBC परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) मामूली बढ़कर 54.7 पर पहुंच गया, लेकिन यह आंकड़ा पिछले चार सालों के निम्नतम स्तर के करीब है, जो मैन्युफैक्चरर्स के लिए एक चुनौतीपूर्ण माहौल को दर्शाता है।
क्यों निर्यात बना सहारा?
भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब एक्सपोर्ट पर ज्यादा निर्भर होता दिख रहा है। अप्रैल में नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स में जबरदस्त उछाल देखा गया, जो पिछले सात महीनों का सबसे बड़ा है। यह ग्लोबल डिमांड, खासकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों से आ रही मांग, ग्रोथ का एक अहम जरिया बनी। इसने घरेलू स्तर पर नई ऑर्डर्स और प्रोडक्शन में दिख रही सुस्ती को कुछ हद तक ढक लिया, जो पिछले तीन-साढ़े तीन सालों में सबसे धीमी गति से बढ़ रहे हैं।
मिडिल ईस्ट संकट से बढ़ी महंगाई की मार
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का सीधा असर भारतीय मैन्युफैक्चरर्स की लागतों पर पड़ रहा है। एल्युमीनियम, केमिकल और फ्यूल जैसे कमोडिटीज (Commodities) के दाम आसमान छूने से इनपुट कॉस्ट में अगस्त 2022 के बाद सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। नतीजतन, मैन्युफैक्चरर्स को बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना पड़ा, जिससे आउटपुट प्राइस इन्फ्लेशन (Output Price Inflation) छह महीने के शिखर पर पहुंच गया। हालांकि, बाजार में कॉम्पिटिशन और ग्राहकों द्वारा कोटेशन स्वीकार करने में हिचकिचाहट के चलते कंपनियां पूरी लागत वसूल नहीं कर पा रही हैं, जो उनके मार्जिन के लिए खतरा पैदा कर रहा है।
वैश्विक परिदृश्य: लागत का दबाव सब जगह
अप्रैल में वैश्विक स्तर पर भी मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटी में लागत का दबाव साफ दिखा। चीन का मैन्युफैक्चरिंग PMI 50.3 पर स्थिर रहा, जो विस्तार का संकेत देता है, लेकिन मार्च में समग्र ग्लोबल PMI 51.8 था, जो मंदी का इशारा कर रहा था। अमेरिका और यूरो जोन में मार्च में ग्रोथ थोड़ी बढ़ी, लेकिन एनर्जी की कीमतों में उछाल और मिडिल ईस्ट से जुड़ी सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण इनपुट लागत में बढ़ोतरी एक आम बात रही। भारत का प्रदर्शन, एक्सपोर्ट की मजबूती के बावजूद, इसी वैश्विक पैटर्न को दर्शाता है।
आगे का रास्ता और मौजूदा जोखिम
मजबूत एक्सपोर्ट परफॉरमेंस और रोजगार में ग्रोथ के बावजूद, सेक्टर के सामने कई जोखिम बने हुए हैं। ग्लोबल ट्रेड में मंदी या भू-राजनीतिक तनाव में और बढ़ोत्तरी एक्सपोर्ट पर निर्भरता को महंगा साबित कर सकती है। इनपुट कॉस्ट और आउटपुट प्राइस के बीच बढ़ता अंतर यह संकेत देता है कि अगर महंगाई ऐसे ही बढ़ती रही तो मार्जिन पर और दबाव आ सकता है। सबसे बड़ी चिंता घरेलू मांग की सुस्ती बनी हुई है, जो नए ऑर्डर्स और आउटपुट ग्रोथ को लगातार धीमा कर रही है। 'मेक इन इंडिया' (Make in India) जैसे इनिशिएटिव को भी ऑपरेशनल असमानता और बाजार की अस्थिरता से जूझना पड़ रहा है।
भविष्य की संभावनाएं
भविष्य की ओर देखें तो मैन्युफैक्चरर्स में सावधानी के साथ उम्मीद बनी हुई है। यह उम्मीद मार्केटिंग एफर्ट्स और प्रोजेक्ट अप्रूवल्स पर टिकी है। उम्मीद है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट 2026 तक $1 ट्रिलियन तक पहुँच सकता है और बाजार का आकार USD 1.74 ट्रिलियन हो सकता है, जो 2031 तक 7.26% की CAGR से बढ़ेगा। हालांकि, यह आशावादी अनुमान बाहरी महंगाई और घरेलू मांग को फिर से जगाने जैसी दोहरी चुनौतियों से निपटने पर निर्भर करेगा।
