आक्रामक FTAs की ओर भारत
भारत सरकार अपनी वैश्विक व्यापार पहुंच का विस्तार करने के लिए एक व्यापक रणनीति पर काम कर रही है। कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने संकेत दिया है कि देश कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) के माध्यम से तरजीही बाजार पहुंच (preferential market access) सुरक्षित करने के लिए पूरी ताकत से जुटा हुआ है। इस पहल के तहत, भारत इजराइल, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC), चिली और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU) जैसे महत्वपूर्ण देशों के साथ उच्च-स्तरीय बातचीत कर रहा है। साथ ही, कनाडा के साथ भी व्यापार वार्ता फिर से शुरू करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इसका अंतिम उद्देश्य भारतीय एक्सपोर्ट्स के लिए वैश्विक बाजार का एक बड़ा हिस्सा खोलना है, जिसका अनुमान 55-60% तक लगाया जा रहा है।
EU डील से मिली बड़ी प्रेरणा
यूरोपीय संघ (EU) के साथ हाल ही में हुए एक बड़े FTA की सफलता ने इस नई व्यापारिक पहल को और गति दी है। अग्रवाल ने बताया कि इनमें से कई नए समझौते इसी वित्तीय वर्ष में अंतिम रूप पा सकते हैं, जो भारत की व्यापार कूटनीति की रफ़्तार को दर्शाता है। इस महत्वाकांक्षी योजना को देश के मजबूत आर्थिक प्रदर्शन का भी सहारा मिल रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 7.4% की विकास दर का अनुमान है, जिसमें सर्विसेज सेक्टर का योगदान 55% से अधिक है और यह 9.1% की दर से बढ़ रहा है।
एक्सपोर्ट्स को मिलेगी नई उड़ान
इस वित्तीय वर्ष में भारत के एक्सपोर्ट्स $850 बिलियन का आंकड़ा पार करने की उम्मीद है, और नए FTAs के प्रभावी होने पर इसमें और तेजी आने की संभावना है। पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY2025) में कुल गुड्स और सर्विसेज एक्सपोर्ट्स $825.3 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे थे। इस रणनीति में केवल गुड्स पर ही नहीं, बल्कि सर्विसेज सेक्टर पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत का लक्ष्य वैश्विक सर्विसेज मार्केट, जिसका आकार $8 ट्रिलियन है, में से $5 ट्रिलियन को अपने FTAs के दायरे में लाना है। यह उच्च-तकनीकी (high-tech) और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देगा।
वैश्विक व्यापार की बदलती तस्वीर
अमेरिका के साथ बातचीत जारी है, हालांकि एक व्यापक FTA को एक लंबी प्रक्रिया माना जा रहा है जिसमें संतुलित प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता होगी। इस पर कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं है। वहीं, आयात के मोर्चे पर, ऊर्जा, सोना और चांदी प्रमुख श्रेणियां बनी हुई हैं। भारत अपनी सप्लाई चेन्स में विविधता बनाए रखने पर जोर दे रहा है ताकि कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक जोखिमों का सामना किया जा सके। उम्मीद है कि ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) में कोई बड़ी वृद्धि नहीं होगी, और साल के अंत तक इसमें $15-20 बिलियन की मामूली वृद्धि देखी जा सकती है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2025 में ट्रेड डेफिसिट $25.04 बिलियन था, जो निर्यात क्षमता के मुकाबले एक मैनेजेबल ट्रेंड दर्शाता है।
बजट का सहयोग और भविष्य की राह
हालिया यूनियन बजट में व्यापार को बढ़ावा देने वाले कई उपायों की घोषणा की गई है। स्पेशल इकोनॉमिक जोन्स (SEZs) को पुनर्गठित किया जा रहा है ताकि घरेलू बाजार तक पहुंच सुनिश्चित की जा सके और नवोदित उद्योगों को सुरक्षा मिले। टेक्सटाइल सेक्टर के लिए पहलों का उद्देश्य माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को वैश्विक सप्लाई चेन्स से जोड़ना है। साथ ही, 200 पुराने मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर्स को पुनर्जीवित करने की योजनाएं भी हैं। भारत कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे विकसित हो रहे अंतरराष्ट्रीय जलवायु नियमों के तहत भी खुद को नुकसान से बचाने की उम्मीद कर रहा है। 27 जनवरी 2026 को भारत-यूरोपियन यूनियन FTA का समापन एक बड़ा मील का पत्थर था, जिसके तहत 2032 तक EU के भारत में एक्सपोर्ट्स दोगुने होने और भारत को 2 बिलियन उपभोक्ताओं के बाजार तक विशेष पहुंच मिलने की उम्मीद है।