पश्चिम अफ्रीकी देश माली में भारत की महत्वाकांक्षी लिथियम एक्सप्लोरेशन (Lithium Exploration) योजना को एक बड़ा झटका लगा है। सुरक्षा की बिगड़ती हालातों और रूस के सरकारी परमाणु निगम, रोसाटॉम (Rosatom) के साथ प्रोजेक्ट के जुड़ाव को लेकर भारतीय कंपनियां खानिज विदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) और एनएलसी इंडिया लिमिटेड (NLC India Ltd) ने इस डील से पीछे हटने का फैसला किया है।
सूत्रों के अनुसार, इस अस्थिर क्षेत्र में निवेश के डूबने का खतरा इतना बढ़ गया था कि इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं था। माली में अल-कायदा से जुड़े आतंकियों द्वारा आर्थिक संपत्तियों और विदेशी निवेशों को निशाना बनाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिसके चलते कई पश्चिमी देश अपने नागरिकों को इस क्षेत्र से दूर रहने की सलाह दे रहे हैं।
भारत अपने इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काफी जोर-शोर से लगा है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 30% EV पैठ (penetration) हासिल करना है। इस लक्ष्य के लिए लिथियम, जो EV बैटरियों का एक मुख्य कॉम्पोनेन्ट (component) है, की सप्लाई सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस प्रोजेक्ट से भारत के बाहर निकलने से इन योजनाओं पर एक प्रश्नचिन्ह लग गया है, और यह दिखाता है कि संसाधन जुटाने में भू-राजनीतिक (geopolitical) समीकरण कितने जटिल हो गए हैं।
भारत लगातार अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे संसाधन-संपन्न देशों में महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) के लिए डील्स की तलाश कर रहा है। जहां KABIL ने 2024 में अर्जेंटीना में एक एक्सप्लोरेशन पैक्ट (pact) पर हस्ताक्षर किए थे, वहीं माली वेंचर (venture) का असफल होना इन आवश्यक संसाधनों तक स्थिर पहुंच बनाने की चुनौतियों को और गहरा करता है। अफ्रीका में रूस की बढ़ती भू-राजनीतिक गतिविधियां, जिसमें माली और बुर्किना फासो के साथ उसके मजबूत होते रिश्ते शामिल हैं, नई दिल्ली के रणनीतिक हितों के लिए अतिरिक्त जटिलताएं पैदा करती हैं।
एक सूत्र ने मामले की संवेदनशीलता बताते हुए कहा, "यह प्रोजेक्ट अभी होल्ड पर है क्योंकि हम ऐसी चीज पर पैसा खर्च नहीं कर सकते जहां हमारे निवेश के डूबने का खतरा हो।" यह बयान भारत की जोखिम से बचने वाली रणनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। हालांकि NLC India Ltd और KABIL दोनों ने इस मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, वहीं रोसाटॉम ने भी कोई बयान जारी करने से इनकार कर दिया है। ऐसे में, माली के उभरते लिथियम क्षेत्र में भारतीय भागीदारी का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। यह कदम, इस अस्थिर परिचालन माहौल को देखते हुए, तत्काल खनिज अधिग्रहण के बजाय संपत्ति की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, जो एक व्यावहारिक दृष्टिकोण माना जा रहा है।