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FY26 में भारतीय शेयर लुढ़के: FIIs की भारी बिकवाली और तेल का झटका, पर घरेलू मांग ने संभाला

ECONOMY
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AuthorKaran Malhotra|Published at:
FY26 में भारतीय शेयर लुढ़के: FIIs की भारी बिकवाली और तेल का झटका, पर घरेलू मांग ने संभाला
Overview

वित्तीय वर्ष 2026 (FY26) के अंत में, भारतीय शेयर बाज़ार दुनिया के उभरते बाज़ारों (Emerging Markets) में अकेला ऐसा बाज़ार रहा जहाँ गिरावट दर्ज की गई। BSE Sensex **7%** से ज़्यादा और Nifty50 **5%** से ज़्यादा लुढ़क गए। इस भारी बिकवाली की मुख्य वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रिकॉर्ड आउटफ्लो और भू-राजनीतिक तनावों के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें रहीं।

FY26 में भारत के शेयर बाज़ार का प्रदर्शन बाकी उभरते बाजारों (EMs) के बिलकुल उलट रहा। जहाँ ताइवान के Taiex में करीब 59% और दक्षिण कोरिया के Kospi में 113% जैसी ज़बरदस्त तेजी देखी गई, वहीं BSE Sensex 7% से ज़्यादा और Nifty50 5% से ज़्यादा गिर गए।

इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण था विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रिकॉर्ड तोड़ बिकवाली, जो FY26 में करीब ₹1.6 लाख करोड़ से ₹1.8 लाख करोड़ तक पहुँच गई। विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय शेयर बाज़ारों का महंगा वैल्यूएशन (High Valuation) भी विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ी रुकावट बना रहा। फरवरी 2026 तक MSCI India का फॉरवर्ड P/E लगभग 21.31x था, जो जनवरी 2026 में MSCI Emerging Markets Index के 13.44x और फरवरी 2026 के 13.46x के मुकाबले काफी ज़्यादा है। बाज़ार गिरने के बाद भी, भारत का P/E, EM औसत से ज़्यादा बना हुआ है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर ईरान से जुड़े संघर्षों ने कच्चे तेल की कीमतों में आग लगा दी है। मार्च 2026 में ही ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $100 प्रति बैरल के पार चला गया और एक ही महीने में 50% से ज़्यादा उछल गया।

भारत, जो अपनी ज़रूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, पर इस बढ़ोतरी का सीधा और गंभीर असर हुआ है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर तेल की कीमतें ऐसे ही ऊंची बनी रहीं, तो FY27 में भारत की GDP ग्रोथ 50 से 70 बेसिस पॉइंट कम हो सकती है और हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी पर महंगाई (Inflation) 55 से 60 बेसिस पॉइंट बढ़ सकती है।

इसके अलावा, करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) भी FY26 के 1% से बढ़कर FY27 में 1.7% तक पहुँचने का अनुमान है, जिससे भारतीय रुपये पर और दबाव बढ़ेगा। मार्च 2026 के अंत तक रुपया पहले ही अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 93.6 से 94.4 पर आ गया था।

इन बाहरी दबावों के बावजूद, भारत के शेयर बाज़ारों को मज़बूत घरेलू तरलता (Domestic Liquidity) से सहारा मिला है। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs), जैसे कि म्यूचुअल फंड और बीमा कंपनियों, का रिकॉर्ड ₹8.3 लाख करोड़ से ₹8.5 लाख करोड़ का इनफ्लो FY26 में हुआ, जिसने विदेशी बिकवाली के असर को काफी हद तक कम कर दिया।

यह घरेलू मांग, मज़बूत निजी खपत (Private Consumption) और इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी खर्च से प्रेरित है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की स्थिर पॉलिसी, जिसमें रेपो रेट 5.25% पर बना हुआ है, भी बाज़ार को कुछ स्थिरता दे रही है।

भारत के बाज़ार के लिए सबसे बड़ा जोखिम पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक संघर्ष का लगातार बढ़ना है, जिससे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी और सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। इससे महंगाई, CAD और रुपये में गिरावट का खतरा बढ़ेगा।

हालांकि, विश्लेषक FY27 में 6.5% से 7.2% तक की GDP ग्रोथ का अनुमान लगा रहे हैं, लेकिन ये अनुमान तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण नीचे जा सकते हैं। FY27 के लिए, विश्लेषकों का नज़रिया सतर्कता के साथ उम्मीद भरा है। अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं और तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो Nifty50 27,500 के स्तर तक जा सकता है।

FY27 में कंपनियों की कमाई (Earnings Growth) 13% से 15% तक बढ़ सकती है, जिसे घरेलू मांग और पॉलिसी सपोर्ट से सहारा मिलेगा।

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