क्यों बढ़ रही है शिक्षा की लागत?
भारत में शिक्षा के क्षेत्र में जिस तेजी से फीस बढ़ रही है, वह आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही है। सरकारी आंकड़े जहां शिक्षा महंगाई दर 3-6% बताते हैं, वहीं स्कूल अक्सर 10-12% या कभी-कभी 42% तक फीस बढ़ा देते हैं। मुंबई जैसे शहर में एक मध्यम-श्रेणी के प्राइवेट स्कूल से 12वीं क्लास तक पढ़ाने का खर्च अब ₹17.3 लाख तक पहुंच गया है, जो कि एक औसत शहरी जोड़े की तीन साल की कमाई (₹5.4 लाख) से भी ज्यादा है। वहीं, कुछ बड़े स्कूलों में यह खर्च ₹61.2 लाख तक जा सकता है, जिसमें अतिरिक्त फीस शामिल नहीं है।
आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंशियल ईयर 12 में शिक्षा पर घरों का खर्च ₹1.8 लाख करोड़ था, जो फाइनेंशियल ईयर 24 तक बढ़कर ₹8.43 लाख करोड़ हो गया है। यह उपभोग खर्च का एक बड़ा हिस्सा बन गया है। मध्यम वर्ग के लिए, शिक्षा में प्रभावी महंगाई दर करीब 9% है, जिसके कारण खर्च करीब आठ सालों में दोगुना हो जाता है, जबकि अच्छी नौकरियों (white-collar sectors) में ग्रोथ काफी धीमी हो गई है।
डिग्री का घटता रिटर्न?
उच्च शिक्षा का बोझ भी कम नहीं है, जहां रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। एक इंजीनियरिंग डिग्री पर ₹34.1 लाख तक का खर्च आ सकता है, लेकिन ग्रेजुएट्स को अक्सर शुरुआती सैलरी ₹4.74 लाख के आसपास ही मिलती है। इसका मतलब है कि निवेश वापस पाने में बीस साल से ज्यादा का समय लग सकता है। ₹15 लाख से ₹40 लाख तक के MBA प्रोग्राम भी जांच के दायरे में हैं, क्योंकि नौकरी बाजार के नतीजे हमेशा इस खर्च को सही नहीं ठहराते। टॉप बिजनेस स्कूलों की प्लेसमेंट दरें घटी हैं, और कई इंजीनियरिंग व MBA ग्रेजुएट्स बिना नौकरी या इंटर्नशिप के ही कार्यबल में शामिल हो रहे हैं।
शिक्षा की लागत और कमाई की क्षमता के बीच यह बढ़ती खाई डिग्रियों को कम वित्तीय रूप से आकर्षक बना रही है, जिससे वे कई परिवारों के लिए उन्नति का पक्का रास्ता न रहकर एक जोखिम भरा निवेश बन गई हैं। विदेशी शिक्षा में भी लोगों की दिलचस्पी कम हो रही है क्योंकि वीज़ा नियम सख्त हो गए हैं।
एडटेक और बाजार पर असर
शिक्षा लागत में मौजूदा रुझान कई संरचनात्मक जोखिम पैदा कर रहा है। स्कूलों की फीस में 10-12% की बढ़ोतरी और आधिकारिक महंगाई दर 3-6% के बीच का अंतर एक ऐसी मूल्य निर्धारण मॉडल का संकेत देता है जिसे बनाए रखना मुश्किल है, जिससे सामर्थ्य (affordability) की समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा, एडटेक (EdTech) फंडिंग 2021 में 4.1 बिलियन डॉलर से घटकर 2025 तक अनुमानित 166 मिलियन डॉलर रह गई है, जो इस क्षेत्र में बिजनेस मॉडल को लेकर निवेशकों के संकोच को दर्शाता है।
माता-पिता अक्सर पाते हैं कि राज्य सरकारें फीस वृद्धि को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पातीं। ग्रेजुएट्स के लिए चुनौतीपूर्ण जॉब मार्केट, बढ़ती बेरोजगारी और स्थिर वाइट-कॉलर नौकरियों की कमी, महंगी डिग्रियों के वित्तीय औचित्य को और कमजोर करती है। K-12 स्कूल बाजार भी बंट रहा है, जहां कम छात्रों के बावजूद उच्च-स्तरीय स्कूल बाजार हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।
भविष्य की राह
इन चुनौतियों के बावजूद, भारत के शिक्षा क्षेत्र में वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है। कुल बाजार 2030 तक 313 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। सिर्फ K-12 सेगमेंट 2030 तक 144.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, जो मजबूत मांग और प्राइवेट स्कूलों की ओर झुकाव से प्रेरित है। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2026 में उच्च शिक्षा राजस्व में 9-11% की वृद्धि देखने को मिल सकती है। हालांकि, निवेशक अब अधिक सतर्क हैं और ठोस व्यावसायिक आधारों, प्रबंधन और विनियमित संचालन पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। बढ़ते अनुपालन लागत के बीच कंपनियां पैमाने (scale) की तलाश में विलय और अधिग्रहण (M&A) की ओर बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा की गुणवत्ता, बुनियादी ढांचे और नौकरी के कौशल में सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि कई भारतीय ग्रेजुएट्स उद्योग की जरूरतों के लिए तैयार नहीं हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जैसे सरकारी प्रयास डिजिटल बदलावों का मार्गदर्शन कर रहे हैं, लेकिन माता-पिता अभी भी फीस नियमों के प्रवर्तन को लेकर चिंतित हैं।
