पढ़ाई का बढ़ता बोझ, आम लोगों की जेब पर भारी
भारत में हायर एजुकेशन की लागत लगातार चिंताजनक दर से बढ़ रही है। एजुकेशन इन्फ्लेशन (Education Inflation) आम कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) महंगाई दर 5-6% के मुकाबले 10-12% सालाना की दर से बढ़ रही है। पिछले कुछ सालों में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ की ट्यूशन फीस में 5-10% सालाना की बढ़ोतरी हुई है। इसका मतलब है कि प्राइवेट संस्थानों से प्रोफेशनल डिग्री की पढ़ाई आज से एक दशक पहले के मुकाबले दो से तीन गुना ज़्यादा महंगी हो चुकी है। नतीजतन, अब परिवारों के बजट का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ पढ़ाई पर खर्च हो रहा है, जिससे एक बड़ा एफोर्डेबिलिटी गैप (Affordability Gap) पैदा हो गया है। मौजूदा दर पर, शिक्षा की लागत अगले 6-7 सालों में दोगुनी हो सकती है, जो एक बड़ी वित्तीय चुनौती है।
एजुकेशन लोन की रिकॉर्ड मांग, लेंडर्स की बल्ले-बल्ले
पढ़ाई की बढ़ती लागत सीधे तौर पर एजुकेशन लोन की मांग को बढ़ा रही है। लोन का औसत आकार ₹5-12 लाख से बढ़कर ₹6-15 लाख हो गया है। मार्च 2019 से मार्च 2025 के बीच देश में कुल आउटस्टैंडिंग (Outstanding) एजुकेशन लोन की रकम में 95.83% का जबरदस्त उछाल आया है। पब्लिक सेक्टर बैंकों ने फाइनेंशियल ईयर 2024 में एजुकेशन लोन अकाउंट्स में 17% की सालाना ग्रोथ दर्ज की और 7,36,580 छात्रों को लोन बांटा। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) इस सेक्टर में अहम खिलाड़ी बनकर उभरी हैं, जिनके एजुकेशन लोन एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) में फाइनेंशियल ईयर 2025 में 50% से ज़्यादा की ग्रोथ देखी गई। अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 में यह ₹80,000 करोड़ तक पहुंच जाएगा, जिसमें 25% की ग्रोथ का अनुमान है। आरबीआई (RBI) के नियमों के अनुसार, ₹7.5 लाख तक के लोन के लिए म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसी संपत्तियों को कोलैटरल (Collateral) के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि बड़ी रकम के लिए पारंपरिक कोलैटरल की ज़रूरत होती है। घरेलू पढ़ाई के लिए लोन की सामान्य राशि ₹7.5-10 लाख और विदेश में पढ़ाई के लिए ₹20 लाख तक है, हालांकि कुछ बैंक इससे ज़्यादा भी लिमिट ऑफर करते हैं। लोन लेने वालों को कोर्स पूरा होने के 12 महीने तक का ग्रेस पीरियड (Grace Period) मिलता है, जिसके बाद रीपेमेंट शुरू होता है। ब्याज दरें आमतौर पर सालाना 4% से 16% तक होती हैं, जो अक्सर आरबीआई (RBI) की रेपो रेट पर आधारित होती हैं।
एजुकेशन बाज़ार का बदलता मिजाज और निवेशकों का फोकस
भारतीय शिक्षा क्षेत्र एक विशाल और बढ़ता हुआ बाज़ार है, जिसका मूल्य 2024 में 125 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा है, जिसमें हायर एजुकेशन का हिस्सा 54% है। उम्मीद है कि यह सेक्टर 2030 तक बढ़कर 330 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो जाएगा। एडटेक (EdTech) सेगमेंट एक प्रमुख ग्रोथ इंजन है, जिसका मूल्य 2.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर है और 2033 तक इसके 33.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। निवेशक अब केवल आक्रामक ग्रोथ के बजाय स्पष्ट मुनाफे के रास्ते, मजबूत गवर्नेंस और बेहतर एग्जीक्यूशन (Execution) वाली कंपनियों पर भरोसा दिखा रहे हैं। पब्लिक मार्केट में वैल्यूएशन्स (Valuations) को रीकैलिब्रेट (Recalibrate) किया गया है, जिसमें कंज्यूमर-सेंट्रिक एडटेक (Consumer-centric EdTech) के मुकाबले रेगुलेटेड (Regulated), डिग्री-लिंक्ड मॉडल को प्राथमिकता दी जा रही है। बाज़ार पूंजीकरण के हिसाब से प्रमुख शिक्षा कंपनियों में NIIT Learning Systems ($416.38 मिलियन), और Veranda Learning Solutions ($141.21 मिलियन)$ शामिल हैं। प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ भी तेज़ी से विस्तार कर रही हैं, जो अक्सर पब्लिक संस्थानों से ज़्यादा फीस वसूलती हैं, क्योंकि उनकी इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और स्पेशलाइज्ड (Specialized) प्रोग्राम्स की भारी मांग है।
एजुकेशन लेंडर्स के लिए बढ़ते जोखिम
इस ग्रोथ के बावजूद, एजुकेशन फाइनेंस में अंतर्निहित जोखिम हैं। एजुकेशन लोन में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) यानी डूबे हुए लोन का राष्ट्रीय औसत 3.6% है, जो पर्सनल लोन की बाकी कैटेगरीज़ में सबसे ज़्यादा है। हालांकि NBFCs अपने ग्रॉस एनपीए (Gross NPAs) को मार्च 2025 तक 0.1% बता रही हैं, लेकिन एक बड़ी कमजोरी यह है कि उनके 85% से ज़्यादा लोन मोरेटोरियम (Moratorium) के तहत हैं, जिससे संभावित स्ट्रेस (Stress) का पता चलने में देरी हो सकती है। अमेरिका और कनाडा जैसे देशों के सख्त वीज़ा नॉर्म्स (Visa Norms) ने विदेशी कोर्स के लिए लोन डिस्बर्समेंट (Disbursement) को धीमा कर दिया है, जिससे NBFCs की ग्रोथ पर असर पड़ा है और उन्हें यूके (UK) और जर्मनी जैसे दूसरे डेस्टिनेशन्स (Destinations) की ओर रुख करना पड़ रहा है। 2024-25 के बजट में कुछ सरकारी स्कॉलरशिप प्रोग्राम्स (Scholarship Programs) को बंद करने से आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों के लिए पढ़ाई और महंगी हो सकती है। डिफॉल्ट्स (Defaults) में बढ़ोतरी इस महत्वपूर्ण सेगमेंट को एक बड़ी राजनीतिक और वित्तीय चिंता का विषय बना सकती है।
आउटलुक: डिसिप्लिन और रेसिलिएंस (Resilience) की ओर बाज़ार
भारतीय शिक्षा बाज़ार अब एक ज़्यादा डिसिप्लिन्ड (Disciplined), इंस्टीट्यूशन-लेड (Institution-led) फेज़ की ओर बढ़ रहा है, जिसमें अर्निंग्स विजिबिलिटी (Earnings Visibility) और सस्टेनेबल ग्रोथ (Sustainable Growth) पर फोकस किया जा रहा है। हायर एजुकेशन में रिफॉर्म-लेड (Reform-led) मोमेंटम (Momentum) दिख रहा है, जिसमें विदेशी यूनिवर्सिटीज़ के ब्रांच कैंपस (Branch Campuses) और बढ़ते प्राइवेट संस्थानों से अवसर पैदा हो रहे हैं। निवेशक रेगुलेटेड मॉडल पर भरोसा जता रहे हैं, जिनसे अनुमानित रेवेन्यू (Revenue) मिल सके। हालांकि एफोर्डेबिलिटी (Affordability) और एम्प्लॉयबिलिटी (Employability) की चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन शिक्षा की अंतर्निहित मांग मज़बूत बनी हुई है, जो बाज़ार के लगातार स्ट्रक्चरल एवोल्यूशन (Structural Evolution) का संकेत देती है।