बढ़ती महंगाई से बॉन्ड यील्ड में उछाल
वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई के चलते बॉन्ड्स में भारी बिकवाली हो रही है, जिससे यील्ड तेज़ी से ऊपर जा रही है। अमेरिका में 10-साल की ट्रेजरी यील्ड 4.66% तक पहुँच गई है, जबकि 30-साल की यील्ड 5.19% के 22-साल के उच्चतम स्तर पर है। इससे लगता है कि बाज़ार मान रहे हैं कि महंगाई को काबू करने के लिए सेंट्रल बैंक्स को ऊंची ब्याज दरें बनाए रखनी होंगी। भारत में भी 10-साल के बॉन्ड यील्ड में बढ़कर 7.15% हो गई है, जिससे सरकार और व्यवसायों के लिए उधार लेना महंगा हो गया है।
फिस्कल डेफिसिट पर दबाव
सरकार के फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटे) को कम करने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा है। ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती, बढ़ी हुई फर्टिलाइजर सब्सिडी, और ऑयल कंपनियों से कॉर्पोरेट टैक्स में संभावित कमी के कारण FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट टारगेट 4.3% से बढ़कर GDP का लगभग 5% तक पहुँच सकता है। इससे सरकार के वित्तीय अनुशासन पर असर पड़ सकता है और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में कमी आ सकती है, जिससे इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी हो सकती है। कुछ अनुमानों के अनुसार, घाटा GDP के 4.5% तक जा सकता है।
रुपया हुआ कमजोर, बढ़ी इम्पोर्टेड महंगाई
साल की शुरुआत में लगभग 90 के स्तर पर चल रहा भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 96.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है, जिससे यह इमर्जिंग मार्केट करेंसीज़ में सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों में से एक बन गया है। इस गिरावट से इम्पोर्टेड महंगाई बढ़ेगी और देश से पूंजी का पलायन हो सकता है, जिससे फाइनेंशियल स्टेबिलिटी को खतरा हो सकता है। उम्मीद है कि रुपया इस तिमाही में लगभग 95.77 और 12 महीनों में 94.23 के आसपास बना रहेगा।
GDP ग्रोथ अनुमानों में कटौती
मिडिल ईस्ट संकट के कारण बढ़ी कच्चे तेल की कीमतें और अल नीनो (El Niño) के संभावित प्रभाव के चलते FY27 के लिए भारत के GDP ग्रोथ अनुमानों को कम किया जा रहा है। ICRA ने अपना अनुमान 6.5% से घटाकर 6.2% कर दिया है, जबकि एक UN रिपोर्ट 6.4% ग्रोथ की उम्मीद कर रही है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च का अनुमान है कि FY26 में अनुमानित 7.6% की तुलना में ग्रोथ घटकर 6.7% हो सकती है। अगर क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल पर बना रहता है, तो गंभीर स्थिति में GDP ग्रोथ घटकर 6% तक आ सकती है और CPI महंगाई 5.5% तक बढ़ सकती है।
महंगाई और मॉनेटरी पॉलिसी की चिंताएं
तेल संकट के कारण होलसेल महंगाई 3.5 साल के उच्चतम स्तर 8.3% पर पहुँच गई है। हालाँकि RBI का अनुमान है कि FY27 के लिए CPI महंगाई 4.8% से 4.9% के बीच रहेगी, लेकिन $100 प्रति बैरल से ऊपर बने रहने वाले क्रूड प्राइसेज महंगाई को और बढ़ा सकते हैं, जिसके लिए पॉलिसी में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि RBI ब्याज दरों को तब तक अपरिवर्तित रखेगा जब तक महंगाई लगातार 6% की ऊपरी सीमा के करीब नहीं पहुँच जाती।
शेयर बाज़ार की स्थिरता परखी जा रही
आर्थिक चुनौतियों के बावजूद, भारतीय शेयर बाज़ार ने घरेलू संस्थागत निवेशकों के दम पर मजबूती दिखाई है। मौजूदा शेयर वैल्यूएशन को उचित माना जा रहा है, जिससे बड़े मार्केट करेक्शन की संभावना कम है, जब तक कि मिडिल ईस्ट संकट और न बढ़े और क्रूड ऑयल की कीमतें $140 प्रति बैरल के पार न चली जाएं। हालाँकि, भू-राजनीतिक तनाव में कोई भी बड़ी बढ़ोतरी बाज़ार में गिरावट ला सकती है।
करंट अकाउंट डेफिसिट में बढ़ोतरी की आशंका
मुख्य रूप से बढ़ी हुई तेल कीमतों के कारण, FY27 में भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) अनुमानित 0.9% से बढ़कर GDP का 2.3% हो सकता है। इस बढ़ते घाटे से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ सकता है, जिसके लिए लगातार पूंजी प्रवाह या ईंधन की कीमतें बढ़ाने जैसे नीतिगत उपायों की आवश्यकता हो सकती है।
आर्थिक विश्लेषण
मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक अस्थिरता और तेल आयात पर भारत की भारी निर्भरता एक मुश्किल आर्थिक स्थिति पैदा कर रही है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें इंडस्ट्री की लागत बढ़ाती हैं, उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता कम करती हैं, और आर्थिक विकास को धीमा करती हैं। ऐतिहासिक रूप से, क्रूड ऑयल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की गिरावट से रिटेल महंगाई 0.2% और होलसेल महंगाई 0.5% कम होती है। इसके विपरीत, कीमतों में वृद्धि इन दबावों को और बढ़ा देती है। बढ़ी हुई आयात लागत से व्यापार घाटा भी बढ़ता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
मुख्य जोखिम
सबसे बड़ा जोखिम लगातार ऊंचे क्रूड ऑयल की कीमतें हैं, जो सीधे तौर पर महंगाई, फिस्कल डेफिसिट और करंट अकाउंट डेफिसिट को प्रभावित करती हैं। मिडिल ईस्ट संकट लंबा खिंचा तो तेल की कीमतें $100-$140 प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। कमजोर होता रुपया इम्पोर्टेड महंगाई को बढ़ाता है और पूंजी पलायन को भी ट्रिगर कर सकता है। इसके अलावा, बजट से ज़्यादा फिस्कल डेफिसिट होने पर सरकार को ज़्यादा उधार लेना पड़ सकता है, जिससे प्राइवेट इन्वेस्टमेंट कम हो सकता है और ग्रोथ धीमी हो सकती है। अल नीनो की संभावना खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकती है और अर्थव्यवस्था को धीमा कर सकती है।
