दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक, भारत, इस समय एक मुश्किल दौर से गुजर रही है। मध्य पूर्व में चल रहे टकराव के कारण ब्रेंट क्रूड (Brent crude) का भाव $94.50-$94.98 प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है। भारत कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) है और अपनी 55% से अधिक सप्लाई के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भर है। बढ़ी हुई कीमतों के कारण आयात बिल (Import Bill) में भारी वृद्धि हुई है। रेटिंग एजेंसी Moody's के अनुसार, इस झटके से भारी मात्रा में विदेशी पूंजी (Foreign Capital) का बहिर्वाह (Outflow) हुआ है। इस साल अब तक निवेशकों ने भारतीय इक्विटी (Equity) से करीब ₹1.27 लाख करोड़ (लगभग $18.6 बिलियन) निकाल लिए हैं। अकेले मार्च महीने में ₹1.13 लाख करोड़ ($12.7 बिलियन) का रिकॉर्ड बहिर्वाह देखा गया। हालाँकि, हाल के दिनों में भारतीय शेयर बाज़ार, खासकर BSE Sensex, ने कुछ मजबूती दिखाई है, पिछले महीने 9.05% का उछाल दर्ज करते हुए 79,273.33 के स्तर पर बंद हुआ।
एक राहत की बात यह है कि मार्च 2026 में भारत का मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट (Merchandise Trade Deficit) उम्मीद से कम होकर $20.67 बिलियन रह गया, जो जून 2025 के बाद सबसे कम है। निर्यात (Exports) और आयात (Imports) दोनों में थोड़ी नरमी ने अस्थायी राहत दी है। लेकिन, पश्चिम एशिया और खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर निर्भरता के कारण आपूर्ति में व्यवधान (Supply Disruption) और माल ढुलाई की लागत (Freight Costs) बढ़ने का जोखिम बना हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे तेल के झटके भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) को बढ़ाते आए हैं, रुपये पर दबाव डालते हैं और महंगाई (Inflation) को बढ़ाते हैं। IMF का अनुमान है कि अगर ऊर्जा की कीमतें बढ़ी रहीं, तो यह भारत की आर्थिक ग्रोथ के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
ईंधन, जैसे एलपीजी (LPG) और डीजल पर दी जाने वाली सब्सिडी (Subsidy) सरकार के लिए एक बड़ा और टिकाऊ न रहने वाला वित्तीय बोझ (Fiscal Burden) बन गई है। इन सब्सिडी के कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को भारी 'अंडर-रिकवरी' (Under-recovery) का सामना करना पड़ता है, जिससे सरकारी वित्त (Government Finances) अस्थिर हो जाते हैं। Moody's ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि इस तरह के राजकोषीय समर्थन, जिसमें पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में कटौती जैसे राजस्व-घटाने वाले उपाय भी शामिल हैं, कर्ज कम करने में बाधा डालते हैं और देश की कर्ज चुकाने की क्षमता को खराब करते हैं। दुनिया के कई अन्य देशों के विपरीत, जहाँ कीमतें बाज़ार के अनुसार तय होती हैं, भारत की सब्सिडी पर निर्भरता एक संरचनात्मक कमजोरी (Structural Weakness) पैदा करती है। Moody's का अनुमान है कि महंगाई वित्त वर्ष 2027 (FY27) में बढ़कर 4.8% तक जा सकती है, जो वित्त वर्ष 2026 (FY26) में 2.4% थी। वित्त वर्ष 2026 के लिए फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) जीडीपी के लगभग 4.5% रहने का अनुमान है।
इन चुनौतियों के बावजूद, Moody's Ratings ने भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग (Sovereign Credit Rating) को Baa3 पर स्थिर आउटलुक के साथ बनाए रखा है। एजेंसी का अनुमान है कि वास्तविक जीडीपी ग्रोथ (Real GDP Growth) वित्त वर्ष 2026 में अनुमानित 7.3% से घटकर वित्त वर्ष 2027 में 6% हो जाएगी। IMF ने ग्रोथ का अनुमान लगभग 6.5%, Standard Chartered ने 6.4% और ICRA ने 6.5% लगाया है। सभी विश्लेषकों का मानना है कि ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतें एक महत्वपूर्ण जोखिम बनी रहेंगी, जो महंगाई को और बढ़ा सकती हैं और करंट अकाउंट डेफिसिट को चौड़ा कर सकती हैं। IMF के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में करंट अकाउंट डेफिसिट -$84.457 बिलियन तक पहुँच सकता है।
