नियमों में ढील, मंज़ूरी में तेज़ी का लक्ष्य
भारत सरकार के यूनियन कैबिनेट ने इन अहम बदलावों को मंजूरी दे दी है, जो अप्रैल 2020 में लागू किए गए सख्त 'प्रेस नोट 3' (Press Note 3) नियमों को कुछ हद तक नरम करते हैं। सबसे बड़ा बदलाव 'बेनिफिशियल ओनर' की परिभाषा को लेकर है, जिसे अब मनी लॉन्ड्रिंग निवारण कानूनों (Prevention of Money Laundering Laws) के नियमों के अनुसार स्पष्ट किया गया है। इसका मतलब है कि अब बॉर्डर देशों से 10% तक की नॉन-कंट्रोलिंग हिस्सेदारी (Non-controlling Stake) के लिए सरकारी मंजूरी की ज़रूरत नहीं होगी, बल्कि वे सीधे 'ऑटोमैटिक रूट' (Automatic Route) से निवेश कर सकेंगे। पहले, इन देशों से किसी भी निवेश, चाहे वह कितना भी छोटा हो, के लिए सरकार की अनुमति लेनी पड़ती थी, जिससे निवेशकों को हिचकिचाहट होती थी।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बूस्ट
इसके अलावा, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और पॉलीसिलिकॉन जैसे प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में आने वाले निवेश प्रस्तावों के लिए 60-दिन का लक्ष्य रखा गया है, ताकि अप्रूवल प्रक्रिया को तेज़ किया जा सके। पहले, 'प्रेस नोट 3' के तहत आवेदन को मंजूरी मिलने में एक साल तक लग सकता था। यह तेज़ प्रक्रिया 'मेक इन इंडिया' (Make in India) और 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) जैसी पहलों को ज़ोरदार झटका देगी और नए कैपिटल व टेक्नोलॉजी को भारत में लाने में मदद करेगी, बशर्ते कि भारतीय कंपनियों का नियंत्रण बना रहे।
वैश्विक संतुलन और चीन का मुद्दा
ये बदलाव भारत के लिए एक नाज़ुक संतुलन बनाने का प्रयास हैं। एक तरफ, देश विदेशी निवेश को आकर्षित करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ, भू-राजनीतिक चिंताओं, विशेषकर चीन के साथ, का भी ध्यान रखना है। 2020 के नियमों के बाद चीन से भारत में निवेश में भारी कमी आई थी, जो फाइनेंशियल ईयर 2020 में लगभग $163.8 मिलियन था और बाद में घटकर लाखों डॉलर में रह गया। नए नियम छोटे, पैसिव निवेशकों के लिए अधिक स्पष्टता प्रदान करते हैं, जिससे ग्लोबल फंड्स के लिए राह आसान हो सकती है।
चुनौतियाँ और आगे की राह
हालांकि, इसमें चुनौतियाँ और जोखिम भी बने हुए हैं। भारत की यह नीति 'आंशिक अनुकूलन' (Partial Optimization) कही जा रही है, जिसका अर्थ है कि चीन जैसे बॉर्डर देशों से महत्वपूर्ण विदेशी निवेश और नियंत्रण वाली हिस्सेदारी पर अभी भी सख्त सरकारी समीक्षा होगी। पिछले अनुभव बताते हैं कि 40% तक आवेदन मध्य 2024 तक लंबित थे, जिससे नई 60-दिन की प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल उठता है। जटिल विदेशी कंपनी संरचनाओं के कारण अंतिम मालिकों की पहचान करना अभी भी मुश्किल हो सकता है। कई उद्योग समूह सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं, खासकर एडवांस्ड चिप डिजाइन और AI हार्डवेयर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में। भारत का FDI $80.62 बिलियन के साथ मजबूत बना हुआ है, और 2026 तक इसमें और वृद्धि की उम्मीद है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताएँ और भू-राजनीतिक तनाव निवेशक के विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।