नियमों में ढील क्यों?
इस कदम का मुख्य मकसद निवेश की प्रक्रिया को और सुगम बनाना, टेक्नोलॉजी को आकर्षित करना और देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (manufacturing sector) को बढ़ावा देना है। सरकार का मानना है कि इससे ग्लोबल सप्लाई चेन (global supply chain) के साथ भारत का जुड़ाव और मजबूत होगा।
किन देशों पर होगा असर?
यह नया नियम विशेष रूप से चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार और अफगानिस्तान जैसे देशों से होने वाले निवेश पर लागू होगा। अब तक, इन देशों के शेयरधारकों वाली विदेशी कंपनियों को भारत में किसी भी सेक्टर में निवेश के लिए सरकारी मंजूरी लेना अनिवार्य था।
'आत्मनिर्भर भारत' को मिलेगा बूस्ट
सरकार इस बदलाव से कंप्लायंस का बोझ कम करना चाहती है और निवेश की मंजूरी में तेजी लाना चाहती है। इससे भारत एक पसंदीदा निवेश और मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर और मजबूत होगा, साथ ही 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) के लक्ष्यों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।
नई परिभाषाएं और समय-सीमा
इन FDI नियमों में ढील के साथ ही, सरकार ने 'बेनिफिशियल ओनर' (Beneficial Owner) की एक स्पष्ट परिभाषा भी जारी की है, जो मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम नियमों (Prevention of Money Laundering Rules) के अनुरूप है। इसके अलावा, कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर मैन्युफैक्चरिंग जैसे विशेष क्षेत्रों में ज़मीन से सटे देशों से आने वाले निवेशों के लिए 60 दिन की समय-सीमा तय की गई है।