India Borrowing: सरकार ने किया ₹8.2 लाख करोड़ के कर्ज़ का ऐलान, बाज़ार में हलचल!

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India Borrowing: सरकार ने किया ₹8.2 लाख करोड़ के कर्ज़ का ऐलान, बाज़ार में हलचल!
Overview

भारत सरकार ने अगले फाइनेंशियल ईयर (FY27) की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के बीच ₹8.2 लाख करोड़ के बड़े कर्ज़ का ऐलान किया है। इस कदम का मक़सद बाज़ार को राहत देना है, खासकर भू-राजनीतिक तनाव और बढ़ती वैश्विक यील्ड्स के माहौल में।

सरकार का कर्ज़ प्लान: ₹8.2 लाख करोड़ का इंतज़ाम

भारत सरकार अगले फाइनेंशियल ईयर 2027 के पहले छह महीनों (अप्रैल-सितंबर) में कुल ₹8.2 लाख करोड़ जुटाने की तैयारी में है। यह रकम पूरे साल के बजट का लगभग आधा है और इसे 26 साप्ताहिक ऑक्शन के ज़रिए हासिल किया जाएगा। सरकार की योजना का एक अहम हिस्सा है कि 25% रकम को लॉन्ग-टर्म सरकारी बॉन्ड्स (30-50 साल की अवधि वाले) में लगाया जाएगा। इसका मक़सद कर्ज़ की मैच्योरिटी को बेहतर तरीके से मैनेज करना है।

वैश्विक अनिश्चितता का साया

यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब बेंचमार्क 10- साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड्स शुक्रवार को 6.95% के स्तर पर पहुंच गए, जो कि जुलाई 2024 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। बाज़ार में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण चिंताएं बढ़ गई हैं, जिससे भारत की फिस्कल हेल्थ और आर्थिक ग्रोथ पर खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में, सरकार का यह कर्ज़ शेड्यूल निवेशकों को कुछ राहत दे सकता है। Star Union Dai-ichi Life Insurance के CIO, रामकमल सामंता का कहना है कि हालिया बॉन्ड स्वैप, स्थिर FY27 कर्ज़ की गति और पिछले साल की तुलना में लॉन्ग-टर्म बॉन्ड्स का कम हिस्सा निवेशकों को आश्वस्त कर सकता है।

तेल की कीमतों और फिस्कल डेफिसिट की चिंता

हालांकि, सबसे बड़ी चिंता तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव को लेकर है, जो मध्य पूर्व संकट की वजह से और बढ़ गए हैं। इससे भारत की आयात लागत बढ़ती है और FY26 और FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट चौड़ा हो सकता है। इस दबाव को कम करने के लिए, सरकार ने डीजल और टरबाइन तेल पर ₹1,500 करोड़ से ज़्यादा के निर्यात शुल्क (Export Duty) लगाने जैसे कदम उठाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत रूस से LNG आयात फिर से शुरू करने पर भी विचार कर रहा है, जिसके लिए अमेरिकी छूट की तलाश है।

कर्ज़ और घाटे पर बनी रहेंगी चिंताएं

बाज़ार में अनुमानित स्पष्टता लाने के बावजूद, सरकार के सामने बड़ी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। भारत का डेट-टू-जीडीपी रेश्यो (Debt-to-GDP Ratio) कुछ इमर्जिंग मार्केट्स के बराबर है, लेकिन अगर आर्थिक ग्रोथ धीमी हुई या कर्ज़ की लागत बढ़ी तो यह और बढ़ सकता है। कुछ देशों के विपरीत, जहां कर्ज़ कम हुआ है, भारत का फिस्कल डेफिसिट एक लगातार चिंता का विषय है, खासकर बड़े कर्ज़ की ज़रूरतें और ऊंची तेल कीमतों जैसे बाहरी झटकों को देखते हुए। लॉन्ग-टर्म बॉन्ड जारी करने से कर्ज़ की मैच्योरिटी मैनेज होती है, लेकिन यह सालों तक ऊंची कर्ज़ लागत को लॉक कर देता है। इसके अलावा, सरकार का ज़्यादा कर्ज़ बाज़ार में लिक्विडिटी को कस सकता है, जिससे महंगाई को कंट्रोल करने के RBI के प्रयासों में बाधा आ सकती है।

बाज़ार का रुख मिला-जुला

बाज़ार का रुख मिला-जुला रहने की उम्मीद है। कुछ निवेशक कर्ज़ कैलेंडर से मिलने वाली स्पष्टता की सराहना करेंगे, जबकि अन्य भू-राजनीतिक जोखिमों और उनके फिस्कल प्रभाव के कारण सतर्क रहेंगे। सरकार की सफलता ऊर्जा की बदलती कीमतों को मैनेज करने और फिस्कल अनुशासन बनाए रखने पर निर्भर करेगी, खासकर अगर वैश्विक ब्याज दरें ऊंची बनी रहती हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि कर्ज़ प्लान फंडिग के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन FY27 के दौरान फिस्कल डेफिसिट लक्ष्यों पर बारीकी से नज़र रखनी होगी।

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