वॉल्यूम रिकॉर्ड पर, पर वैल्यू में भारी गिरावट
2026 की पहली तिमाही (Q1 2026) में भारत में Dealmaking की गतिविधि ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। कुल 686 सौदे हुए, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन, यह शानदार वॉल्यूम कुल डील वैल्यू में 48% की गिरावट को नहीं छुपा सका। डील वैल्यू घटकर $16 बिलियन पर आ गई। इसका मुख्य कारण यह रहा कि इस तिमाही में कोई बड़े, अरबों डॉलर वाले सौदे नहीं हुए। पिछले क्वार्टर में जहां 7 बड़े सौदे हुए थे जिनकी वैल्यू $15 बिलियन थी, वहीं इस बार सिर्फ 2 ऐसे सौदे हुए जिनकी कुल वैल्यू $4.1 बिलियन थी। यह ट्रेंड ग्लोबल मार्केट में भी देखने को मिल रहा है, जहां बड़े सौदों की कमी है।
पब्लिक मार्केट में निवेशक सावधान
वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का असर भारतीय पब्लिक मार्केट पर भी साफ दिखा। Initial Public Offerings (IPOs) और Qualified Institutional Placements (QIPs) में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। IPOs और QIPs की संख्या में 63% की कमी आई, जबकि इनकी वैल्यू 78% तक गिर गई। यह दर्शाता है कि कंपनियां और निवेशक फिलहाल नए फंड जुटाने में सावधानी बरत रहे हैं, जो कि ग्लोबल ट्रेंड के अनुरूप है। 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक विकास का अनुमान 2-3% के आसपास है, जिसमें भारत जैसे उभरते बाजार अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन रफ्तार थोड़ी धीमी रहने की उम्मीद है।
M&A में आउटबाउंड डील्स का दबदबा
Mergers and Acquisitions (M&A) सेगमेंट में भी वैल्यू में 59% की गिरावट आई, कुल 271 सौदों की वैल्यू $6.9 बिलियन रही। बड़े घरेलू सौदों की कमी इसका मुख्य कारण रही। हालांकि, इस मंदी के बीच 'आउटबाउंड M&A' (भारतीय कंपनियों का विदेश में किया गया अधिग्रहण) एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा। कुल M&A वैल्यू का 56% हिस्सा 56 आउटबाउंड डील्स से आया। इसका एक प्रमुख उदाहरण Coforge का $2.4 बिलियन में Encora का अधिग्रहण था। भारतीय कंपनियों का वैश्विक स्तर पर विस्तार करने का यह रुझान टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में क्षमताएं बढ़ाने और स्केल हासिल करने की उनकी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। इनबाउंड M&A (विदेशी कंपनियों का भारत में अधिग्रहण) भले ही Q3 2023 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर रहा, लेकिन आउटबाउंड डील्स की मजबूती रणनीतिक बदलाव का संकेत देती है।
प्राइवेट इक्विटी का फोकस छोटे ग्रोथ फर्म्स पर
Private Equity (PE) में सौदों की संख्या में 9% की बढ़ोतरी हुई, कुल 415 सौदे हुए। लेकिन, डील वैल्यू 34% घटकर $9.1 बिलियन रह गई। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि PE निवेशक अब छोटे सौदों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। छोटे सौदों का औसत आकार घटकर $21.8 मिलियन रह गया, जो पिछले क्वार्टर में $36.3 मिलियन था। निवेशकों ने हाई-ग्रोथ वाली फर्म्स पर दांव लगाया। इस दौरान Neysa Networks, Juspay, और Neo Asset Management जैसी 3 नई यूनिकॉर्न कंपनियों ने $703 मिलियन जुटाए। PE मार्केट का यह ट्रेंड दिखाता है कि पूंजी का निवेश चुनिंदा, ग्रोथ-ओरिएंटेड कंपनियों में हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि एशिया से नए रेज किए गए PE फंड्स का एक तिहाई से अधिक पैसा भारत में आ रहा है, जो बाजार की लंबी अवधि की संभावनाओं में मजबूत विश्वास को दर्शाता है।
सेक्टर ट्रेंड्स और चिंताएं
डील वॉल्यूम के मामले में रिटेल और कंज्यूमर सेक्टर सबसे आगे रहे, जहां 145 सौदे हुए। IT और ITES सेक्टर वैल्यू के हिसाब से सबसे ऊपर रहा, जिसने AI और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के चलते $3.5 बिलियन आकर्षित किए। एनर्जी सेक्टर, खासकर रिन्यूएबल्स (नवीकरणीय ऊर्जा) में भी $2.2 बिलियन के सौदों के साथ अच्छी खासी रुचि दिखी। हालांकि डील वॉल्यूम मजबूत बना हुआ है, लेकिन वैल्यू और वॉल्यूम के बीच लगातार बना गैप चिंता का विषय है। बड़े सौदों की कमी संकेत देती है कि बड़े निवेशक आर्थिक अनिश्चितताओं या कुछ क्षेत्रों में ऊंची वैल्यूएशन के कारण भारी पूंजी लगाने में झिझक रहे होंगे। भारत में डीलमेकिंग का ध्रुवीकरण (polarization), जहां सौदे कुछ चुनिंदा बाजारों में केंद्रित हो रहे हैं, एक जोखिम पैदा कर सकता है अगर घरेलू ग्रोथ धीमी पड़ती है या इनबाउंड निवेश कम रहता है। आउटबाउंड M&A की मजबूत स्थिति यह भी दर्शाती है कि भारतीय कंपनियां घर में बड़ी रणनीतिक अवसरों की कमी या अंतरराष्ट्रीय विस्तार को प्राथमिकता दे रही हैं। PE में छोटे सौदों पर फोकस बड़े, पूंजी-गहन घरेलू प्रोजेक्ट्स के प्रति सतर्क दृष्टिकोण को इंगित करता है।
आउटलुक घरेलू फंडामेंटल्स से जुड़ा
डील वैल्यू में कमी के बावजूद, ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में लगातार चार तिमाहियों से हो रही बढ़ोतरी से अंतर्निहित गति मजबूत बनी हुई है। ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर, ग्रोथ, शांति विजयेथा ने कहा कि निवेशकों का लगातार भरोसा और मजबूत घरेलू फंडामेंटल्स प्रमुख चालक हैं। 2026 में, बाजार से उम्मीद है कि वह हाई-क्वालिटी एसेट्स, स्ट्रेटेजिक कार्व-आउट्स और प्राइवेट कैपिटल के डिप्लॉयमेंट पर ध्यान केंद्रित करेगा, खासकर टेक्नोलॉजी और एनर्जी ट्रांजिशन जैसे क्षेत्रों में। जैसे-जैसे वैश्विक बाजार स्थिर होंगे, भारत की पॉलिसी निरंतरता और ग्रोथ की संभावनाएं निवेश आकर्षित करती रहेंगी, हालांकि सौदों के साइज और वैल्यूएशन को लेकर एक प्रैक्टिकल नजरिया बना रहेगा।