सरकारी राहत: पेट्रोकेमिकल्स पर ड्यूटी में बड़ी छूट
इस फैसले के पीछे की वजहों और इसके संभावित असर को विस्तार से समझते हैं:
भारत सरकार ने 2 अप्रैल से 30 जून, 2026 तक 40 प्रमुख पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स पर से कस्टम ड्यूटी हटा दी है। इस फैसले से सरकारी खजाने पर करीब ₹1,800 करोड़ का बोझ पड़ने का अनुमान है। यह कदम पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजारों में आई अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में $100 प्रति बैरल के पार जाने का सीधा नतीजा है। इस वजह से फार्मा, टेक्सटाइल, प्लास्टिक और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे कई उद्योगों को कच्चे माल (feedstock) की सप्लाई में दिक्कत और शिपिंग लागत बढ़ने से भारी परेशानी झेलनी पड़ रही थी।
वैश्विक दबाव और भारत के लक्ष्य
भारत का पेट्रोकेमिकल सेक्टर 2025 तक $300 बिलियन और 2040 तक $1 ट्रिलियन का बड़ा लक्ष्य लेकर चल रहा है। लेकिन, यह सेक्टर अस्थिर वैश्विक बाजार में खड़ा है। चीन, अमेरिका और यूरोप जैसे देश अपने एडवांस टेक्नोलॉजी और इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते कम लागत पर ऑपरेट करते हैं। भारत जहां आत्मनिर्भर बनने और 'चाइना+1' का विकल्प बनने की कोशिश कर रहा है, वहीं कच्चे तेल (लगभग 85% इम्पोर्ट पर निर्भर) और मिडिल ईस्ट से आने वाले फीडस्टॉक पर भारी निर्भरता उसे भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है। यह भेद्यता FY27 के लिए महंगाई के अनुमानों में बढ़ोतरी और 2026 के लिए Goldman Sachs जैसी फर्मों द्वारा GDP ग्रोथ के अनुमानों में कटौती के रूप में सामने आई है। टेक्सटाइल सेक्टर ने अकेले तेल और शिपिंग की बढ़ी कीमतों के कारण इनपुट लागत में 20-25% की बढ़ोतरी बताई है। ऐतिहासिक रूप से, तेल की कीमतों में भारी उछाल ने भारत के ट्रेड डेफिसिट को बढ़ाया है और रुपए को कमजोर किया है।
जोखिम: छिपी महंगाई और राजकोषीय दबाव
जहां ड्यूटी में छूट से उद्योगों को तत्काल राहत मिली है, वहीं आलोचक चिंतित हैं कि यह एक 'टेंपररी फिक्स' है जो गहरी आर्थिक समस्याओं को छिपा रहा है। एक बड़ी चिंता यह है कि यह फैसले आयातित महंगाई (imported inflation) के असली स्तर को छुपा सकता है, जिससे अल्पकालिक राहत तो मिलेगी पर लगातार बढ़ती लागत की समस्या हल नहीं होगी, खासकर अगर भू-राजनीतिक मसले जारी रहते हैं। पश्चिम एशिया और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे ट्रांजिट पॉइंट्स से महत्वपूर्ण फीडस्टॉक पर भारत की निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक संचालन के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती है। ऐसी किसी भी रुकावट से अन्य एशियाई पेट्रोकेमिकल हब में देखे गए हालात की तरह ही कमी और उत्पादन बंद हो सकता है। इसके अलावा, ₹1,800 करोड़ के राजस्व का नुकसान, अन्य सरकारी खर्चों के समायोजन के साथ मिलकर, राजकोषीय सेहत पर दबाव डालता है। यह सेक्टर अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में उच्च परिचालन लागत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने के अपने लक्ष्य को हासिल करने में चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भविष्य की राह: भू-राजनीति और विकास
भारत के पेट्रोकेमिकल उद्योग का दीर्घकालिक दृष्टिकोण मजबूत बना हुआ है, जो घरेलू मांग और प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी सरकारी योजनाओं से प्रेरित है। हालांकि, वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव निकट भविष्य पर छाया डाल रहे हैं। यह अस्थायी ड्यूटी छूट उद्योग की बाहरी झटकों के प्रति निरंतर भेद्यता को उजागर करती है। विश्लेषकों ने इन दबावों के कारण कंपनियों की अर्निंग्स में संभावित कटौती के चलते निकट अवधि में बाजार में गिरावट की चेतावनी दी है। उद्योग का भविष्य वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता और भारत की राजकोषीय सेहत से समझौता किए बिना इन जोखिमों को प्रबंधित करने की उसकी सफलता पर निर्भर करेगा, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महंगाई नियंत्रण से बाहर न जाए।