लिक्विडिटी का संकट
साल 2022 में भारत में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (VDA) के लिए लागू किए गए टैक्स नियमों का मकसद सट्टेबाजी को रोकना था, लेकिन इसने अनजाने में लिक्विडिटी (liquidity) की समस्या पैदा कर दी है। हर ट्रांजेक्शन पर 1% टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) लगाने से हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग पर भारी बोझ पड़ रहा है, जो प्राइस डिस्कवरी (price discovery) की प्रक्रिया को बाधित कर रहा है। निवेशक तेजी से विदेशी प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर रहे हैं, जहां यह भारी भरकम टैक्स ढांचा लागू नहीं है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि वॉल्यूम कम होने के बजाय, कैपिटल का पलायन हो रहा है। यह वैसी ही स्थिति है जैसी उन देशों में होती है जहां कैपिटल कंट्रोल्स (capital controls) बहुत सख्त होते हैं, और डोमेस्टिक एक्सचेंज (domestic exchange) ऑर्डर बुक के घटने से जूझते हैं, जबकि यूजर्स गैर-अनुपालन वाले, और अक्सर ज्यादा जोखिम भरे, विदेशी माहौल में चले जाते हैं।
आर्बिट्रेज (Arbitrage) और रेगुलेटरी गैप
भारत की फिस्कल पॉलिसी (fiscal policy) और यूरोपीय यूनियन के MiCA रेगुलेशन या अमेरिका के फॉर्म 1099-DA जैसे ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के बीच का अंतर एक बड़ा आर्बिट्रेज (arbitrage) का अवसर बना रहा है। जहां विकसित देश OECD के क्रिप्टो-एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (CARF) के जरिए ऑटोमेटेड, डेटा-ड्रिवन रिपोर्टिंग की ओर बढ़ रहे हैं ताकि मार्केट की कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचाए बिना अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके, वहीं भारत अभी भी ट्रांजेक्शन-आधारित टैक्स पर अटका हुआ है। नेट प्रॉफिट (net profit) की परवाह किए बिना, ग्रॉस टर्नओवर (gross turnover) पर टैक्स की गणना पर यह निर्भरता, मॉडर्न पोर्टफोलियो मैनेजमेंट (portfolio management) की वास्तविकता को नजरअंदाज करती है। नतीजतन, लोकल VDA सर्विस प्रोवाइडर्स (VDA service providers) को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों के साथ मुकाबला करना मुश्किल हो रहा है, जो अधिक अनुकूल, नेट-गेन-ओरिएंटेड (net-gain-oriented) टैक्स कानूनों के तहत काम करते हैं।
डोमेस्टिक इनोवेशन (Domestic Innovation) पर स्ट्रक्चरल रिस्क
ट्रेडिंग वॉल्यूम (trading volume) पर तत्काल असर के अलावा, मौजूदा टैक्स ढांचा डोमेस्टिक फाइनेंशियल इनोवेशन (financial innovation) के लिए एक गंभीर दीर्घकालिक जोखिम पैदा करता है। नुकसान को मुनाफे के मुकाबले सेट-ऑफ (set-off) की अनुमति न देकर, यह पॉलिसी डिजिटल एसेट्स को पारंपरिक इक्विटी (equities) या डेरिवेटिव्स (derivatives) से मौलिक रूप से अलग मानती है। यह मार्केट के प्रोफेशनलाइजेशन (professionalization) को हतोत्साहित करता है और रिटेल पार्टिसिपेंट्स (retail participants) को एक तिरछे रिस्क-रिवार्ड प्रोफाइल (risk-reward profile) में डालता है, जहां विजेता बहुत ज्यादा भुगतान करते हैं जबकि हारने वालों को कोई राहत नहीं मिलती। जब इन फिस्कल फ्रिक्शन्स (fiscal frictions) के कारण ट्रेडिंग की लागत संभावित रिटर्न (yield) से अधिक हो जाती है, तो मार्केट डेप्थ (market depth) स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाती है। एक ऐसे फ्रेमवर्क की ओर झुकाव के बिना जो पोर्टफोलियो-स्तरीय दक्षता (portfolio-level efficiency) को पहचानता है, डोमेस्टिक इकोसिस्टम (ecosystem) उच्च-लागत, कम-लिक्विडिटी गतिविधि के एक अलग-थलग पॉकेट बनने का जोखिम उठाता है, जो इंस्टीट्यूशनल कैपिटल (institutional capital) को आकर्षित करने के लिए संघर्ष करता है।
रेगुलेटरी बदलाव का पूर्वानुमान
भविष्य की पॉलिसी एडजस्टमेंट्स (policy adjustments) सरकार की डिजिटल एसेट्स को एक अलग, टैक्सेबल विसंगति (taxable anomaly) के बजाय एक आधुनिक, डिजिटल-फर्स्ट कैपिटल मार्केट (capital market) के हिस्से के रूप में मानने की इच्छा पर निर्भर करेंगी। 2027 में CARF लागू होने की समय सीमा से पहले अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के साथ तालमेल बिठाने का दबाव, रीकैलिब्रेशन (recalibration) के लिए एक छोटा सा अवसर प्रदान करता है। उम्मीद है कि फोकस ट्रांजेक्शन-लेवल कॉस्ट (transaction-level costs) को कम करने और लॉस-ऑफसेट मैकेनिज्म (loss-offset mechanisms) को पेश करने की ओर बढ़ेगा। इन बदलावों को लागू करने में विफलता मौजूदा कैपिटल एग्जोडस (capital exodus) को मजबूत कर सकती है, जिससे डोमेस्टिक मार्केट केवल सबसे इनइलास्टिक रिटेल यूजर्स (inelastic retail users) की सेवा कर सकेगा, जबकि प्रोफेशनल लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स (liquidity providers) अधिक अनुकूल नियामक माहौल में अपना पलायन जारी रखेंगे।
