भारत में फॉर्मल क्रेडिट यानी औपचारिक कर्ज का विस्तार धीमा पड़ता दिख रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ज़्यादा कर्ज वाले ग्राहकों का आंकड़ा **15%** पहुंच गया है, जबकि नए ग्राहक बनने की रफ्तार भी कम हो गई है। ऐसे में बैंक और कर्ज देने वाली कंपनियां अब अपने मौजूदा ग्राहकों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
कर्जदारों का बढ़ता बोझ
भारत की फॉर्मल क्रेडिट यानी औपचारिक कर्ज व्यवस्था में तेजी के बाद अब चुनौतियां सामने आ रही हैं। कर्ज लेने वाले ग्राहकों की संख्या में वृद्धि की गति धीमी पड़ गई है। हालिया ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) की एक स्टडी के मुताबिक, योग्य आबादी में से क्रेडिट-एक्टिव (जिनके पास कर्ज है) ग्राहकों का हिस्सा 2017 में 11% से बढ़कर मार्च 2026 तक 28% हो गया है।
हालांकि, इस आधार के लिए कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 2024-2026 की अवधि में घटकर 9% रह गया है, जो 2017 से 2019 के बीच दर्ज 14% से काफी कम है।
ज़्यादा कर्ज वाले ग्राहकों में बढ़ोतरी
वित्तीय संस्थानों के लिए एक बड़ी चिंता ज़्यादा कर्ज वाले ग्राहकों (over-leveraged consumers) की बढ़ती संख्या है। ये ऐसे लोग हैं जिन पर इतना कर्ज है कि शायद वे उसे चुकाने की क्षमता से ज़्यादा हो। स्टडी बताती है कि इंडस्ट्री के हस्तक्षेप के बाद, ऐसे कर्जदारों का अनुपात FY26 तक 15% पर पहुंच गया, जो FY24 में 18% के शिखर पर था। यह ट्रेंड खासकर युवा कर्जदारों में ज्यादा दिख रहा है, जो हाल के रिटेल क्रेडिट डिमांड के मुख्य चालक रहे हैं।
मौजूदा ग्राहकों पर फोकस
कर्ज देने वालों के लिए औपचारिक क्रेडिट सिस्टम में नए ग्राहकों को लाना मुश्किल हो रहा है। रिटेल लोन (retail loan) देने में 'न्यू-टू-क्रेडिट' (जिनके पास पहले कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं थी) व्यक्तियों का योगदान काफी कम हो गया है। यह 2017 में 32% से घटकर 2026 तक सिर्फ 13% रह गया है। यह डेटा बताता है कि बैंकिंग सेक्टर क्रेडिट ग्रोथ बनाए रखने के लिए नए लोगों तक पहुंचने के बजाय मौजूदा ग्राहकों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहा है।
कंजम्पशन-ड्रिवन क्रेडिट डिमांड
कर्ज लेने के पैटर्न में बड़ा बदलाव आया है। पर्सनल लोन (personal loans), क्रेडिट कार्ड (credit cards) और ड्यूरेबल फाइनेंसिंग (durable financing) जैसे कंजम्पशन-ओरिएंटेड क्रेडिट प्रोडक्ट्स (consumption-oriented credit products) रिटेल कर्जदारों के लिए पहली पसंद बन गए हैं। इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने वाले एक्टिव कर्जदारों का प्रतिशत 34% से बढ़कर 51% हो गया है। यह दिखाता है कि लोग लाइफस्टाइल से जुड़े कर्ज की ओर बढ़ रहे हैं, जो इकोनॉमिक साइकल्स और इंटरेस्ट रेट में उतार-चढ़ाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं, खासकर सिक्योरड लोन (secured loans) की तुलना में।
कमर्शियल और रीजनल क्रेडिट ट्रेंड्स
कमर्शियल लेंडिंग (Commercial lending) में भी सिकुड़न के संकेत दिख रहे हैं, क्रेडिट-एक्टिव एंटरप्राइजेज (credit-active enterprises) का हिस्सा मार्च 2026 तक 9% तक गिर गया है। इसके अलावा, फॉर्मल सिस्टम में प्रवेश करने वाले नए कमर्शियल कर्जदारों की संख्या कम हुई है, जो MSMEs के बीच एक अनछुआ सेगमेंट दिखाता है।
भौगोलिक रूप से, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में ग्रोथ बढ़ी है, लेकिन इन नए क्षेत्रों में विस्तार के लिए कर्जदाताओं को संभावित एसेट क्वालिटी इश्यूज (asset quality issues) से बचने के लिए सख्त अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (underwriting standards) बनाए रखने की जरूरत है। इन बाधाओं के बावजूद, फॉर्मल फाइनेंस की कुल पैठ ऊंची बनी हुई है, 74% क्रेडिट-योग्य भारतीयों ने 2017 में 35% की तुलना में कम से कम एक बार फॉर्मल क्रेडिट का लाभ उठाया है।
