वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 में भारत के आठ प्रमुख कोर सेक्टर्स का ग्रोथ रेट 4% रहा। यह वृद्धि मुख्य रूप से स्टील और सीमेंट उत्पादन में आई ज़बरदस्त तेज़ी के दम पर हासिल हुई है।
सीमेंट और स्टील की ताबड़तोड़ परफॉरमेंस
जनवरी में कोर इंडस्ट्रीज के लिए ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन सीमेंट और स्टील सेक्टर रहे। दिसंबर 2025 में स्टील उत्पादन में 6.9% की सालाना बढ़ोतरी देखी गई, जिससे फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के अप्रैल-दिसंबर के लिए इसका कुल ग्रोथ 9.5% हो गया। भारत में स्टील की मांग में वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 9% की मज़बूत बढ़ोतरी का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट है। वहीं, सीमेंट उत्पादन दिसंबर 2025 में 13.5% तक बढ़ा, और इसी फाइनेंशियल ईयर की अवधि में इसका कुल ग्रोथ 8.8% रहा। सीमेंट इंडस्ट्री ने वित्त वर्ष 2026 में 6-7% डिमांड ग्रोथ का अनुमान लगाया है। इस सकारात्मक मोमेंटम को इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) का भी सपोर्ट मिला है, जिसमें यूनियन बजट 2026-27 में पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए ₹12.2 लाख करोड़ का आवंटन किया गया है।
इंडस्ट्री में दिख रही असमानता
जहां स्टील और सीमेंट में अच्छी ग्रोथ दिख रही है, वहीं कोर इंडस्ट्रीज के कुछ अन्य अहम सेक्टर में गिरावट आई है। दिसंबर 2025 में कच्चे तेल (Crude Oil) के उत्पादन में 5.6% और नेचुरल गैस में 4.4% की कमी आई। रिफाइंड प्रोडक्ट्स में भी 1.0% का मामूली संकुचन देखा गया। यह दिखाता है कि इंडस्ट्रियल रिकवरी एक समान नहीं है। हालांकि, HSBC इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI के अनुसार, मैन्युफैक्चरिंग एक्टिविटीज़ में विस्तार हुआ, जो दिसंबर के 55.0 से बढ़कर जनवरी 2026 में 55.4 पर पहुंच गया। लेकिन, इनपुट कॉस्ट (Input Cost) पिछले चार महीनों में सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ी है और बिजनेस कॉन्फिडेंस (Business Confidence) भी कमजोर बना हुआ है। FICCI के एक सर्वे में तीसरी तिमाही (Q3 FY26) के लिए उत्पादन के रिकॉर्ड लेवल और क्षमता उपयोग (Capacity Utilization) 75% पर रहने की बात कही गई, लेकिन यह भी सामने आया कि 57% मैन्युफैक्चरर्स को कच्चे माल की कीमतों के कारण प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने का सामना करना पड़ रहा है।
ओवरसप्लाई और मार्जिन पर दबाव का जोखिम
स्टील और सीमेंट दोनों सेक्टरों में आक्रामक क्षमता विस्तार (Capacity Expansion) की योजनाओं से बड़े जोखिम पैदा हो रहे हैं। भारतीय स्टील सेक्टर रिकॉर्ड गति से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है, जिससे अगर ग्लोबल डिमांड उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ी तो ओवरसप्लाई की समस्या खड़ी हो सकती है। इसके अलावा, भारतीय स्टील स्टॉक्स अपने ग्लोबल साथियों की तुलना में ऊंचे वैल्यूएशन मल्टीपल्स पर ट्रेड कर रहे हैं। सीमेंट सेक्टर में वित्त वर्ष 2028 तक 158 मिलियन टन से ज़्यादा नई क्षमता जुड़ने की उम्मीद है, खासकर उत्तरी भारत में। इससे रीजनल प्राइस वोलेटिलिटी (Price Volatility) और मार्जिन में कमी की आशंका बढ़ गई है, जिसमें कवर की गई कंपनियों के लिए 1-2% की निगेटिव प्राइसिंग CAGR का अनुमान है। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कंप्लायंस की जटिलताएं, रेगुलेटरी अनिश्चितता, बिजली सप्लाई में रुकावटें और खराब ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी पुरानी चुनौतियाँ भी प्रदर्शन को बाधित कर रही हैं। मैक्रो-इकोनॉमिक (Macro-economic) स्तर पर भी कुछ चिंताएं हैं, जैसे जनवरी 2026 में भारत का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) बढ़कर 10.38 बिलियन डॉलर हो गया और बेरोजगारी 5.0% पर पहुंच गई।
आगे का रास्ता: चुनौतियों के बीच विकास
भारत के इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए आगे का नज़रिया लगातार ग्रोथ का है, जिसे इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकारी पहलों का सपोर्ट मिला है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के वित्त वर्ष 2026 में 7% बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, आगे का रास्ता चुनौतियों से भरा है। कुछ चुनिंदा सेक्टर्स में ग्रोथ का कंसंट्रेशन, स्टील और सीमेंट में ओवरसप्लाई के मंडराते खतरे, बढ़ती इनपुट कॉस्ट और मैन्युफैक्चरिंग की मौजूदा स्ट्रक्चरल दिक्कतें, एक सतर्क रहने की ज़रूरत पर ज़ोर देती हैं। जबकि पॉलिसी का रुख विस्तार का समर्थन करता है, यह देखना अहम होगा कि ये सेक्टर बिना किसी बड़ी प्राइस या मार्जिन कंप्रेशन के नई क्षमता को कैसे अवशोषित कर पाते हैं।