'सिस्टमिक गिविंग' की ओर बड़ा कदम
भारत का CSR सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2035 तक सालाना खर्च ₹1.2 लाख करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगा, जो 2024 के करीब ₹35,000 करोड़ के अनुमान से काफी ज्यादा है। यह बड़ा उछाल सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा सकता है। मौजूदा ट्रेंड यह है कि कंपनियां अब सिर्फ क्लासरूम बनाने या गैजेट्स बांटने जैसे छोटे, कम समय वाले प्रोजेक्ट्स पर पैसे खर्च करने के बजाय 'सिस्टमिक गिविंग' की ओर बढ़ रही हैं। इस मॉडल का मतलब है कि पब्लिक सिस्टम को मजबूत करने वाले शुरुआती प्रोजेक्ट्स और प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट को सपोर्ट करना, ताकि वे सरकारी प्रोग्राम्स के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर काम कर सकें। इससे कॉर्पोरेट फंड को देश के विकास के लिए 'रिस्क कैपिटल' की तरह इस्तेमाल किया जा सकेगा। NIPUN Bharat Mission इसका एक अच्छा उदाहरण है, जहां कंपनियों ने ₹13,000 करोड़ से ज्यादा का सरकारी खर्च बेहतर लर्निंग पर फोकस करने में मदद की।
'इम्पैक्ट' मापने की बड़ी चुनौती
हालांकि 'सिस्टमिक गिविंग' का आइडिया बहुत अच्छा है, लेकिन इसे लागू करने में कई अड़चनें हैं। सबसे बड़ी मुश्किल है कि इन पहलों का लंबे समय तक चलने वाला 'इम्पैक्ट' कैसे मापा जाए। यह अक्सर CSR फंडिंग के सामान्य प्रोजेक्ट टाइमलाइन से कहीं आगे का मामला होता है। छोटे प्रोजेक्ट्स के नतीजों को गिनना आसान होता है, लेकिन सिस्टम में बदलाव, जैसे कि पॉलिसी, संस्थागत क्षमता और सामाजिक व्यवहार में बदलाव, को सीधे CSR के काम से जोड़ना और उसका सटीक मूल्यांकन करना बहुत मुश्किल और सब्जेक्टिव हो जाता है। ऐसे में 'इम्पैक्ट वॉशिंग' का खतरा बढ़ जाता है, जहां कंपनियां अपने कामों के सामाजिक फायदे को बढ़ा-चढ़ाकर बता सकती हैं या सफलता का श्रेय बिना ठोस सबूत के ले सकती हैं। इन सिस्टमिक पहलों के लिए जवाबदेही तय करने के लिए एडवांस्ड डेटा सिस्टम, इंडिपेंडेंट इवैल्यूएशन मैकेनिज्म और ट्रांसपेरेंट रिपोर्टिंग की जरूरत है, जो फिलहाल बड़े और जटिल सामाजिक प्रोजेक्ट्स के लिए पूरी तरह विकसित नहीं हैं।
ग्लोबल बेंचमार्किंग और भारतीय क्षमता
दुनिया भर में 'सिस्टमिक फिलेंथ्रॉपी' मॉडल अपनाए जा रहे हैं, लेकिन उनके मेजरमेंट और जवाबदेही के ढांचे अभी अलग-अलग स्तर पर हैं। विकसित देशों में अक्सर स्थापित रिसर्च बॉडीज और फिलेंथ्रॉपिक फाउंडेशन होते हैं जिनके पास लंबे समय तक चलने वाले इम्पैक्ट स्टडीज का काफी अनुभव होता है। इसके विपरीत, भारत का CSR सेक्टर तेजी से बढ़ तो रहा है, लेकिन ऐसे गहरे विश्लेषणात्मक काम करने की क्षमता अभी विकसित हो रही है। फाइनेंस सेक्टर, जिसमें Axis Bank जैसी संस्थाएं शामिल हैं, कॉर्पोरेट प्रैक्टिसेज को बेहतर बनाने में योगदान देती हैं। लेकिन, इस फाइनेंशियल समझ को सिस्टमिक बदलावों के प्रभावी सोशल इम्पैक्ट मेजरमेंट में बदलना, सोशल साइंस और इम्पैक्ट इवैल्यूएशन में खास स्किल की मांग करता है, जो अभी सभी कंपनियों के CSR लीडरशिप में पूरी तरह शामिल नहीं है। CSR बजट का 10–20% सिस्टमिक निवेश के लिए आवंटित करना एक सुझाव है, लेकिन इसकी सफलता इन जटिल पहलों को मापने और रिपोर्ट करने की क्षमता बनाने में समानांतर निवेश पर निर्भर करती है।
आगे का रास्ता: बातों से ज़्यादा काम पर ज़ोर
भारत में CSR के लिए 'सिस्टमिक गिविंग' की ओर बढ़ना एक जरूरी कदम है, जो बेहतर एफिशिएंसी और ज्यादा गहरा सामाजिक प्रभाव लाने का वादा करता है। हालांकि, इस क्षमता को हकीकत में बदलने के लिए, सिर्फ बातों से आगे बढ़कर, मजबूत इम्पैक्ट मेजरमेंट, कड़े जवाबदेही और पारदर्शी रिपोर्टिंग के ठोस तंत्र स्थापित करने होंगे। इनके बिना, सिस्टमिक पहलों की ओर जा रहे भारी-भरकम डोनेशन का प्रभाव कम हो सकता है या वे झूठे सामाजिक फायदों के दावों का शिकार हो सकते हैं। भविष्य में इस सेक्टर में इम्पैक्ट मेट्रिक्स को स्टैंडर्डाइज करने, इंडिपेंडेंट इवैल्यूएशन को बढ़ावा देने और कॉर्पोरेट डोनर्स, नॉन-प्रॉफिट्स और सरकारी एजेंसियों के बीच गहरी साझेदारी बनाने पर ध्यान केंद्रित होने की संभावना है, ताकि स्थायी सामाजिक बदलाव के लिए साझा जवाबदेही तय की जा सके।