PHDCCI की सरकार से गुहार: 'नियम सरल करो, लागत घटाओ', बिजनेस के लिए बड़ी मांग

ECONOMY
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AuthorAditya Rao|Published at:
PHDCCI की सरकार से गुहार: 'नियम सरल करो, लागत घटाओ', बिजनेस के लिए बड़ी मांग
Overview

भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) और भारी उद्योगों के लिए राहत की खबर! PHD Chamber of Commerce and Industry (PHDCCI) ने सरकार से बिजनेस के नियमों को बेहद सरल बनाने और कंप्लायंस कॉस्ट (Compliance Cost) को कम करने की जोरदार मांग की है।

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क्यों भारत में बिजनेस करना है मुश्किल?

देश में मौजूदा बिजनेस रेगुलेशंस (Regulations) कई सेक्टर्स में भारी कंप्लायंस कॉस्ट और जोखिम पैदा कर रहे हैं। ये नियम, खासकर भारी उद्योगों से जुड़े MSMEs के लिए एक बड़ी बाधा हैं। PHD Chamber of Commerce and Industry (PHDCCI) ने इन मुश्किलों को दूर करने के लिए कई बदलावों का प्रस्ताव दिया है। उनका तर्क है कि वर्तमान नियम बिना किसी खास वैल्यू एडिशन के ऑपरेशनल खर्चे बढ़ा रहे हैं और भारत की इंडस्ट्री की कॉम्पिटिटिवनेस (Competitiveness) के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट्स (Manufacturing Exports) में ग्रोथ को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। PHDCCI का सुझाव है कि बिजनेस को वास्तव में आसान बनाने के लिए सिंपल, डिजिटल और रिस्क-बेस्ड रूल्स की ओर बढ़ा जाए।

कागजी कार्रवाई और दोहराव वाले नियम बनाते हैं बोझ

हर साल होने वाली मैंडेटरी कॉर्पोरेट फाइलिंग्स, जैसे MGT-7 और AOC-4, में अक्सर कंपनियों को ओवरलैपिंग (Overlapping) जानकारी जमा करनी पड़ती है। इस दोहराव से कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ जाती है और पेनल्टी (Penalty) का जोखिम भी, जबकि रेगुलेटरी वैल्यू ज्यादा नहीं बढ़ती। कई MSMEs को कम इनकम थ्रेशोल्ड (Threshold) के कारण मैंडेटरी टैक्स ऑडिट (Tax Audit) का सामना करना पड़ता है, जो उन पर भारी वित्तीय और एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ डालता है। इसके अलावा, टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स (TCS) और टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स (TDS) दोनों का होना रिकंसिलिएशन (Reconciliation) और एडमिनिस्ट्रेशन को जटिल बना देता है, जिससे रिसोर्सेज (Resources) कोर बिजनेस एक्टिविटीज से हट जाते हैं। दुनिया की कई कॉम्पिटिटिव इकोनॉमीज़ (Economies) SMEs की मदद के लिए सिंगल सिस्टम और उच्च ऑडिट थ्रेशोल्ड जैसे सरल तरीके अपनाती हैं, जो भारतीय बिजनेस के लिए मुश्किलों से बिल्कुल विपरीत है।

GST की दिक्कतें और फाइनेंशियल मार्केट की चुनौतियाँ

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) के तहत, इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) मिलना अक्सर इस बात पर निर्भर करता है कि सप्लायर (Supplier) ने नियमों का पालन किया है या नहीं। यह स्थिति खरीदारों को तब नुकसान पहुंचाती है जब उनके सप्लायर्स अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहते हैं। इससे बिजनेस में अनिश्चितता और एडमिनिस्ट्रेटिव तनाव बढ़ता है, जो सप्लाई चेन्स (Supply Chains) और कैश फ्लो (Cash Flow) को बाधित करता है। अन्य चिंताओं में फाइनेंशियल मार्केट्स (Financial Markets) से जुड़े मुद्दे शामिल हैं, जैसे गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (Government Securities) पर हाई 'हेयरकट्स' (Haircuts - वैल्यू में कमी), CSGL अकाउंट्स की संख्या पर लिमिट्स और प्राइस बैंड (Price Band) के अस्पष्ट नियम। ये मुद्दे सामूहिक रूप से फिक्स्ड-इनकम इन्वेस्टर्स (Fixed-Income Investors) के लिए जोखिम बढ़ाते हैं और इन मार्केट्स पर निर्भर इंडस्ट्रीज के लिए कैपिटल कॉस्ट (Capital Cost) बढ़ा सकते हैं।

PHDCCI के सरल बिजनेस के लिए समाधान

PHDCCI के प्रस्तावों में प्रैक्टिकल बदलाव शामिल हैं। वे एक सिंगल कंबाइंड एनुअल फाइलिंग (Combined Annual Filing) बनाने का सुझाव देते हैं, जो कई कॉर्पोरेट सबमिशन को इंटीग्रेट (Integrate) करेगा, खासकर MSMEs के लिए प्रक्रिया को सरल बनाएगा। चैंबर टैक्स ऑडिट थ्रेशोल्ड को ₹5 करोड़ से ₹10 करोड़ तक बढ़ाने और सरल कंप्लायंस के लिए ओवरलैपिंग TCS और TDS नियमों को मिलाने की भी सिफारिश करता है। GST के लिए, प्रस्ताव है कि ITC की एलिजिबिलिटी (Eligibility) को सप्लायर की कार्रवाई से अलग किया जाए, जिससे वेंडर्स (Vendors) अपने डिफॉल्ट्स (Defaults) के लिए सीधे जिम्मेदार हों। फाइनेंशियल मार्केट्स में, वे CSGL अकाउंट के नियमों को स्टैंडर्डाइज (Standardize) करने, हेयरकट पॉलिसी को एडजस्ट (Adjust) करने और क्रेडिट लिमिट में बदलावों में पारदर्शिता बढ़ाने का प्रस्ताव देते हैं ताकि एक अधिक प्रेडिक्टेबल (Predictable) माहौल बन सके।

आसान नियमों से एक्सपोर्ट्स को बढ़ावा

PHDCCI प्रेसिडेंट राजीव जुनेजा ने जोर देकर कहा कि डिजिटल और रिस्क-बेस्ड सिस्टम्स के साथ नियमों को सरल बनाना, खासकर MSMEs के लिए, बिजनेस ऑपरेशंस को आसान बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एक स्टेबल (Stable), प्रेडिक्टेबल रेगुलेटरी एनवायरनमेंट (Regulatory Environment) सिर्फ एक एडमिनिस्ट्रेटिव फिक्स (Administrative Fix) नहीं, बल्कि एक स्ट्रेटेजिक नेसेसिटी (Strategic Necessity) है। इन बदलावों को लागू करने से इंडस्ट्री कॉम्पिटिटिवनेस को बढ़ावा मिलने और भारत के मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट्स में सस्टेन्ड ग्रोथ (Sustained Growth) को गति मिलने की उम्मीद है। वर्तमान रेगुलेटरी फ्रिक्शन (Regulatory Friction) को भारत की एक्सपोर्ट पोटेंशियल (Export Potential) पर एक मुख्य सीमा माना जाता है, जो ग्लोबल मार्केट्स में कॉम्पिटिटिवनेस को प्रभावित करता है। इसे संबोधित करना राष्ट्रीय आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.