फिस्कल पॉलिसी में बड़ा यू-टर्न!
सरकार ने अपनी राजकोषीय नीति की दिशा बदल दी है। अब से देश का कर्ज़ (Debt) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मुकाबले कितना है, इसे सरकार की वित्तीय सेहत का मुख्य पैमाना माना जाएगा। यह कदम वित्तीय पारदर्शिता और लचीलेपन को बढ़ाने के लिए उठाया गया है। सरकार का मध्यम अवधि का लक्ष्य 2030-31 तक इस अनुपात को लगभग 50% तक लाना है।
कर्ज़ का बोझ और बाज़ार पर असर
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी, 2026 को पेश बजट में इस बदलाव का ऐलान किया। यह तब हो रहा है जब सरकार का ग्रॉस बॉरोइंग (Gross Borrowing) यानी कुल उधार 2025-26 के ₹14.61 लाख करोड़ से बढ़कर 2026-27 में ₹17.2 लाख करोड़ होने का अनुमान है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार को पुराने कर्ज़ चुकाने हैं और अनुमानित 4.3% फिस्कल डेफिसिट को पूरा करना है।
इस भारी उधार की सप्लाई और गिरते रुपये के कारण सरकारी बॉन्ड यील्ड्स (Government Bond Yields) पर दबाव बढ़ा है। बेंचमार्क 10-साल की यील्ड लगभग 6.7% के आसपास बनी हुई है। बाज़ार में इसकी प्रतिक्रिया भी दिखी, सेंसेक्स (Sensex) इंडेक्स में गिरावट दर्ज की गई, जो निवेशकों की उधार योजनाओं के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाता है।
कर्ज़ चुकाने का बढ़ता खर्चा
ज्यादा उधार लेने का सीधा मतलब है सरकार के इंटरेस्ट पेमेंट्स (Interest Payments) यानी ब्याज के भुगतान में बढ़ोतरी। 2026-27 के लिए यह भुगतान ₹14.04 लाख करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है, जो 2025-26 के ₹12.76 लाख करोड़ से काफी ज्यादा है। अकेले ब्याज का यह भुगतान सरकार के कुल अनुमानित ₹53.47 लाख करोड़ के एक्सपेंडिचर (Expenditure) का लगभग 26% है। यह राशि सरकार की कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) यानी पूंजीगत व्यय ₹12.22 लाख करोड़ से भी ज्यादा है। इससे पता चलता है कि सरकार के सामने कर्ज़ प्रबंधन और विकास कार्यों में निवेश के बीच संतुलन बनाने की कितनी बड़ी चुनौती है।
ग्लोबल अनिश्चितता और रणनीति
कर्ज़-GDP अनुपात को मुख्य पैमाना बनाने का फैसला सिर्फ एक अकाउन्टिग बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे वित्तीय ढांचे की ओर कदम है जो बदलती वैश्विक परिस्थितियों में ज्यादा लचीलापन प्रदान करता है। 2025-26 के इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) में भी कर्ज़-GDP टारगेट को एक "ठोस प्रतिबद्धता" बताया गया था, जो नीतिगत समायोजन की गुंजाइश देता है। सरकार ने आने वाले दो सालों के लिए कर्ज़-GDP अनुपात के विशिष्ट रोलिंग टारगेट (Rolling Targets) को होल्ड पर रखने का कारण वैश्विक भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक अनिश्चितताओं को बताया है। इस रणनीति का मकसद मध्यम अवधि में प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में खर्च के लिए संसाधन खाली करना है।
मध्यम अवधि की योजनाएं
2026-27 के लिए 55.6% का कर्ज़-GDP टारगेट, 2030-31 तक 49% से 51% के बीच का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस लंबी अवधि के लक्ष्य का आधार 10% की अनुमानित नॉमिनल GDP ग्रोथ है, जिससे कुल आर्थिक आउटपुट ₹393 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। अर्थशास्त्रियों का भी नॉमिनल GDP ग्रोथ पर यही अनुमान है। कर्ज़ में स्पष्ट कमी का लक्ष्य भारत की क्रेडिट रेटिंग को मजबूत करने और उधार लागत को कम करने में मदद करेगा, जो देश के ऊंचे पब्लिक डेट के इतिहास को देखते हुए महत्वपूर्ण है। सरकार का राजकोषीय अनुशासन और कैपिटल एक्सपेंडिचर में बड़ा इजाफा, आर्थिक चुनौतियों से निपटने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने की उसकी रणनीति का मुख्य आधार हैं।