यूनियन बजट 2024: कहीं ये आर्थिक समस्याओं को बढ़ाने वाला तो नहीं? राज्यों पर बोझ और रोजगार पर बड़े सवाल

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
यूनियन बजट 2024: कहीं ये आर्थिक समस्याओं को बढ़ाने वाला तो नहीं? राज्यों पर बोझ और रोजगार पर बड़े सवाल
Overview

भारत का नया यूनियन बजट देश की सबसे बड़ी आर्थिक समस्याओं जैसे बढ़ती असमानता, बेरोजगारी और सुस्त प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को सुलझाने में नाकाम साबित हुआ है। इसके बजाय, सरकार ने वित्तीय शक्तियों के केंद्रीकरण पर जोर दिया है, जिससे राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ा है और रोजगार योजनाओं की फंडिंग का तरीका भी बदला है।

क्या आर्थिक मोर्चे पर बजट की गाड़ी पटरी से उतरी?

इस बजट का फोकस असली आर्थिक जरूरतों से हटकर, केवल सार्वजनिक कथाओं को मजबूत करने पर लगता है। यह देश में पहले से मौजूद वित्तीय असंतुलन और शासन की समस्याओं को और बढ़ा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और सुस्त प्राइवेट इन्वेस्टमेंट जैसे गंभीर मुद्दों को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया है। ऐसा लगता है कि सरकार का जोर वास्तविक, गहरी समस्याओं के समाधान से ज्यादा, अपनी बातों और नीतियों को जनता तक बेहतर तरीके से पहुंचाने पर है।

अर्थव्यवस्था की असली दिक्कतें अनछुई

आज देश की अर्थव्यवस्था कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रही है। बढ़ती असमानता लोगों की खर्च करने की क्षमता को लगातार कम कर रही है। वहीं, युवाओं में बेरोजगारी और स्थिर वेतन दरें एक बड़ी चिंता बनी हुई हैं। इन सबके चलते प्राइवेट इन्वेस्टमेंट भी रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन दिक्कतों को दूर करने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास में बड़े पब्लिक खर्च की जरूरत है। साथ ही, रोजगार पैदा करने वाली नीतियां और छोटे-मझोले उद्योगों (MSMEs) को मजबूत सहारा देना जरूरी है। लेकिन, इस बजट में ऐसी कोई खास पहल या बड़े आवंटन नजर नहीं आते। इसके बजाय, वित्तीय फैसले ऐसे लग रहे हैं जैसे वे सरकारी नियंत्रण को बढ़ाने वाले हों, खासकर राज्यों के साथ। इसने पहले से मौजूद आर्थिक चिंताओं को और हवा दी है।

राज्यों पर बढ़ा वित्तीय दबाव

इस बजट की एक बड़ी खासियत है वित्तीय शक्तियों का बढ़ता केंद्रीकरण। 14वें वित्त आयोग ने राज्यों को टैक्स के बंटवारे में 42% हिस्सेदारी देने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इनपुट टैक्स (Cesses) और सरचार्ज (Surcharges) की दरें बढ़ाकर अप्रत्यक्ष रूप से राज्यों की हिस्सेदारी कम कर दी है। बजट 2025-26 के आंकड़ों से पता चलता है कि जब केंद्र के टैक्स रेवेन्यू में कमी आती है, तो सबसे पहले राज्यों को दी जाने वाली ग्रांट्स (Grants) और केंद्रीय योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes) में कटौती की जाती है। इससे केंद्र का खजाना तो भरता है, लेकिन राज्यों के बजट पर भारी दबाव पड़ता है। उदाहरण के लिए, हाल ही में ₹1,62,748 करोड़ के रेवेन्यू शॉर्टफॉल के चलते ग्रांट्स और योजनाओं में बड़ी कटौती की गई, जिसका असर राज्यों को झेलना पड़ रहा है। जीएसटी (GST) और दूसरे नियमों के बोझ तले दबे राज्यों के लिए यह स्थिति और भी मुश्किल है। 2019 में कॉर्पोरेट टैक्स दर में की गई एकतरफा कटौती, जिससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ, ऐसी ही एक मिसाल है। इस पर राज्यों से कोई खास सलाह-मशविरा नहीं किया गया था, जिससे राजस्व की कमी का पूरा बोझ राज्यों पर आ गया। अब 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें भी राज्यों की टैक्स हिस्सेदारी 41% पर बनाए रखने और रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट्स को खत्म करने की बात करती हैं, जो राज्यों के लिए और सख्त वित्तीय अनुशासन का संकेत है।

रोजगार योजनाओं में बड़ा फेरबदल

रोजगार के मोर्चे पर भी एक बड़ा और अहम बदलाव देखने को मिला है। बजट में 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) एक्ट' (VB-G RAM G) पेश किया गया है, जो MGNREGA की जगह लेगा। इस नई स्कीम के तहत 125 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है। लेकिन, इसकी फंडिंग का तरीका पूरी तरह बदल दिया गया है। अब केंद्र सरकार केवल 60% हिस्सा देगी, जबकि राज्यों को 40% लागत वहन करनी होगी। यह MGNREGA से काफी अलग है, जहां अकुशल मजदूरी का लगभग 100% खर्च केंद्र उठाता था। इस बदलाव से राज्यों पर, खासकर जहां रोजगार की मांग ज्यादा है और वित्तीय क्षमता कम है, भारी बोझ पड़ेगा। VB-G RAM G के लिए ₹95,692 करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है, जबकि 2026-27 के लिए MGNREGA का आवंटन घटाकर सिर्फ ₹30,000 करोड़ कर दिया गया है। यह साफ दिखाता है कि सरकार एक अधिकार-आधारित, मांग-संचालित योजना से हटकर, एक आपूर्ति-संचालित मॉडल की ओर बढ़ रही है, जो पूरी तरह केंद्रीय बजट और राज्य के योगदान पर निर्भर करेगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे काम मिलने की सीमाएं तय हो सकती हैं और स्कीम का दायरा कम हो सकता है।

असलियत पर भारी पड़ी 'नरेटिव कंट्रोल' की रणनीति

कुल मिलाकर, यह बजट सरकार के उस पुराने रवैये को दर्शाता है जहां वे असल नीतियों और सुधारों से ज्यादा, दिखावे और अपनी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने पर ध्यान देते हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकार चुनिंदा डेटा के आधार पर अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट रही है, जबकि देश की असल आर्थिक हकीकत को नजरअंदाज कर रही है। भले ही यह तरीका राजनीतिक तौर पर फायदेमंद हो, लेकिन यह अच्छी शासन व्यवस्था और देश की बुनियादी आर्थिक समस्याओं को हल करने के लिए कहीं ज्यादा नुकसानदायक है।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.