राज्यों के कंधे पर कैपेक्स का दारोमदार
सरकार ने FY27 के लिए ₹12.2 लाख करोड़ के कैपेक्स का लक्ष्य रखा है, जो FY26 के संशोधित अनुमान ₹11.0 लाख करोड़ से 11.5% ज्यादा है। यह बड़ा पुश एक रणनीतिक बदलाव के साथ आया है, जिसमें कैपेक्स योजनाओं को लागू करने का बड़ा जिम्मा अब राज्य सरकारों पर डाला गया है। पूंजीगत कार्यों के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को 50-वर्षीय ब्याज-मुक्त ऋण (interest-free loans) का आवंटन बढ़ाकर ₹2.0 लाख करोड़ कर दिया गया है, जो FY26 RE के ₹1.5 लाख करोड़ से काफी ज्यादा है। यह राशि कुल कैपेक्स वृद्धि का लगभग आधा है। इसके अलावा, पूंजीगत संपत्ति (Capital Assets) निर्माण के लिए ग्रांट्स इन एड (Grants in Aid) में 60% की शानदार बढ़ोतरी की गई है, जो अब ₹4.9 लाख करोड़ हो गई है। इन सबको मिलाकर प्रभावी कैपेक्स (effective capital expenditure) ₹17.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो FY26 RE की तुलना में 22.1% की तेज वृद्धि है। इसका मकसद GDP ग्रोथ को सहारा देना है, खासकर जब निजी क्षेत्र का निवेश असमान रहने की उम्मीद है।
वित्तीय अनुशासन और कर्ज का बोझ
सरकार वित्तीय अनुशासन (fiscal prudence) बनाए रखने के अपने लक्ष्य पर कायम है। FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficit) का अनुमान GDP के 4.3% पर रखा गया है, जो FY26 के संशोधित अनुमान 4.4% से थोड़ा कम है। यह एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक आर्थिक माहौल में मैक्रोइकॉनॉमिक स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाया गया कदम है। केंद्रीय सरकार का कर्ज FY27 में GDP के 55.6% रहने का अनुमान है, जो FY26 RE के 56.1% से कम है। इससे पता चलता है कि सरकार उधारी के जरिए संपत्ति निर्माण पर जोर दे रही है, जो मध्यम अवधि में कर्ज को कम करने के लक्ष्य के अनुरूप है।
मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट और मार्केट की चिंता
सरकार ने बायो-फार्मा, सेमीकंडक्टर और टेक्सटाइल जैसे प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों को पॉलिसी सपोर्ट (policy support) दिया है, जिसका लक्ष्य घरेलू क्षमता बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके लिए कस्टम ड्यूटी (customs duty) को सरल बनाने जैसे कदम उठाए जाएंगे। हालांकि, बॉन्ड मार्केट (bond market) इस बजट के बाद दबाव बढ़ने की आशंका जता रहा है। FY27 के लिए नेट डेटेड मार्केट बोर्रोइंग (net dated market borrowing) ₹11.7 लाख करोड़ तय की गई है, जो पिछले साल से 3.6% की मामूली बढ़ोतरी है। लेकिन, कुल इश्यूएंस (gross issuances) में बड़ी उछाल देखी गई है, जो ₹17.2 लाख करोड़ तक पहुंच गई है, जबकि FY26 में यह ₹14.6 लाख करोड़ थी। यह इश्यूएंस का बढ़ा हुआ स्तर बाजार की उम्मीदों से ज्यादा है और सरकारी सिक्योरिटीज की यील्ड (yield) पर ऊपर की ओर दबाव डाल सकता है।
विनिवेश के लक्ष्य और हकीकत
सरकार ने FY27 के लिए मिसलेनियस कैपिटल रिसीट्स (miscellaneous capital receipts) का लक्ष्य ₹800 अरब (0.2% of GDP) रखा है, जो काफी हद तक विनिवेश (disinvestment) से मिलने वाले पैसों पर निर्भर करेगा। हालांकि, पिछले सालों के प्रदर्शन को देखें तो विनिवेश के लक्ष्य अक्सर पूरे नहीं हो पाते। FY2022-26 के दौरान यह आय GDP का मामूली 0.07% से 0.17% ही रही है। राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए मजबूत विनिवेश के बजाय खर्चों में कटौती पर निर्भरता, सरकार की विवेकाधीन खर्च (discretionary spending) की क्षमता को सीमित करती है और लंबी अवधि की वित्तीय सेहत को चुनौती दे सकती है।
एक्सपर्ट की राय
ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट, अदिति नायर का कहना है कि कर्ज समेकन (debt consolidation) की गति उम्मीद से कुछ धीमी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बजट की महत्वाकांक्षी योजनाओं की सफलता पूरी तरह से इन पूंजीगत व्यय पहलों के समय पर और प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है। FY27 के लिए भारत के आर्थिक दृष्टिकोण में सार्वजनिक कैपेक्स से सहारा मिलने की उम्मीद है, खासकर जब निजी क्षेत्र का निवेश असमान रहने की संभावना है।