क्यों निकाल रहे हैं FPIs पैसा?
ग्लोबल मार्केट से मिले मिले-जुले संकेतों, अमेरिका में AI पर फोकस बढ़ना और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाज़ारों से पैसे निकालना जारी रखा है। जनवरी 2026 में ही FPIs ने ₹38,740 करोड़ के भारतीय इक्विटीज़ बेच दिए, जो कि अगस्त 2025 के बाद किसी एक महीने में सबसे बड़ी बिकवाली है। यह रुझान पिछले साल 2025 में ₹2.40 लाख करोड़ की रिकॉर्ड निकासी के बाद आया है।
इस बिकवाली का असर निफ्टी 50 इंडेक्स पर भी दिखा, जिसने जनवरी 2026 में 10 साल में अपना सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 3.10% की गिरावट दर्ज की। FPIs की इक्विटी होल्डिंग्स अब कई सालों के निचले स्तर पर आ गई हैं।
बजट 2026: निवेशकों का भरोसा लौटेगा?
आगामी यूनियन बजट 2026 को लेकर वित्त मंत्रालय पर FPIs की बिकवाली को रोकने के लिए कदम उठाने का भारी दबाव है। बाज़ार के जानकार और उद्योग संगठन भारत को एक आकर्षक निवेश डेस्टिनेशन बनाने के लिए टैक्स में बड़ी राहत की वकालत कर रहे हैं।
सबसे खास उम्मीदें लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स को लेकर हैं। मौजूदा नियम के तहत, 24 महीने से ज़्यादा समय तक रखे गए लिस्टेड इक्विटीज़ पर 12.5% का LTCG टैक्स लगता है, जिसमें ₹1.25 लाख तक की छूट है। एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि इस छूट को बढ़ाकर ₹2 लाख कर देना चाहिए और टैक्स की दर को 10% तक लाने पर भी विचार किया जा सकता है।
सिक्योरिटीज ट्रांज़ैक्शन टैक्स (STT) पर भी चर्चा चल रही है, लेकिन रेवेन्यू को देखते हुए इसे पूरी तरह खत्म करना मुश्किल लग रहा है। कुछ उद्योग प्रतिनिधियों ने पर्सनल इनकम टैक्स सरचार्ज को भी तर्कसंगत बनाने और प्रभावी टैक्स दर को 30% पर सीमित करने की मांग की है, क्योंकि उनका मानना है कि मौजूदा ऊंची दरें पूंजी और टैलेंट के लिए 'एग्जिट ट्रिगर' का काम कर रही हैं।
इकोनॉमिक ग्रोथ और सेक्टर फोकस
आर्थिक मोर्चे पर, इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने FY26 के लिए 7.4% की मजबूत रियल जीडीपी ग्रोथ का अनुमान लगाया है, और FY27 के लिए 6.8%–7.2% का अनुमान है। यह भारत को दुनिया की अग्रणी ग्रोथ इकोनॉमीज़ में से एक बनाता है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच महंगाई (Inflation) औसतन 1.7% पर रही है, जिससे कुछ हद तक फिस्कल स्पेस मिला है। सरकार FY26 के लिए 4.4% के डेफिसिट टारगेट के साथ फिस्कल कंसोलिडेशन पर टिकी हुई है। इंफ्रास्ट्रक्चर ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर पर ज़ोर दिया जा रहा है।
बजट से डिफेंस स्टॉक्स जैसे सेक्टरों में भी बढ़त की उम्मीद है। मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट्स और सरकारी डिसइन्वेस्टमेंट प्लान्स पर भी बारीकी से नजर रखी जा रही है।
आगे का रास्ता
यूनियन बजट की सफलता विदेशी पूंजी को आकर्षित करने और बनाए रखने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगी, जो कि पॉलिसी की स्पष्टता और ठोस इंसेंटिव्स प्रदान करने से ही संभव है। हालांकि, पिछली बार दी गई फिस्कल राहत के चलते बड़े टैक्स बदलावों की उम्मीदें थोड़ी कम हैं, पर कैपिटल गेन्स टैक्सेशन में लक्षित समायोजन बाज़ार के सेंटिमेंट को काफी प्रभावित कर सकते हैं। एक फिस्कली प्रूडेंट लेकिन ग्रोथ-ओरिएंटेड बजट ही नियर से मीडियम टर्म में इक्विटी मार्केट के प्रदर्शन का मुख्य निर्धारक होगा। टैक्स कॉम्पिटिटिवनेस और ग्लोबल इकोनॉमिक हेडविंड्स का मुकाबला करने की सरकार की रणनीति निवेशक का भरोसा फिर से स्थापित करने के लिए महत्वपूर्ण होगी।