स्वास्थ्य सुरक्षा का नया अध्याय, पर राजकोष पर दबाव?
केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया ने 40 साल से ऊपर के मजदूरों के लिए मुफ्त सालाना स्वास्थ्य जांच की घोषणा की है। इसका मकसद बीमारियों का जल्दी पता लगाना है। इसके अलावा, ईएसआईसी (ESIC) का कवरेज तेजी से बढ़ा है, जो आज लगभग 15 करोड़ लोगों तक पहुंच गया है। यह संख्या एक दशक पहले के मुकाबले लगभग दोगुनी है। इस विस्तार में खतरनाक नौकरियों और छोटे व्यवसायों के श्रमिकों को भी शामिल किया गया है, जो सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की सरकार की मंशा को दिखाता है। कुल मिलाकर, भारत में सामाजिक सुरक्षा का कवरेज 19% (2015) से बढ़कर 2025 तक 64.3% तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें 94 करोड़ से अधिक लोग शामिल होंगे।
लेबर कोड्स और श्रमिकों को नई उम्मीदें
सरकार ने चार प्रमुख श्रम संहिताओं (Labour Codes) को एकीकृत किया है, जिनका उद्देश्य मौजूदा कानूनों को सरल बनाना और नई सुरक्षाएं प्रदान करना है। इसमें समान वेतन और मातृत्व अवकाश (maternity leave) की अवधि को 12 से बढ़ाकर 26 हफ्ते करना शामिल है। गिग (gig) और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में औपचारिक रूप से जोड़ा गया है। सरकार को उम्मीद है कि ये कोड्स औपचारिकता (formalization) को बढ़ावा देंगे और जीडीपी में वृद्धि करेंगे।
कम पब्लिक हेल्थ खर्च, ज्यादा वेलफेयर की मांग?
यह एक चिंताजनक तथ्य है कि भारत का पब्लिक हेल्थ पर खर्च जीडीपी का केवल 1.3% से 1.8% के बीच रहा है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। वहीं दूसरी ओर, सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी कार्यक्रमों पर सरकार की प्रतिबद्धताएं लगातार बढ़ रही हैं। हालांकि, बीमारी का पता लगाने के लिए की जाने वाली ये निवारक स्वास्थ्य जांचें भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च को कम कर सकती हैं, लेकिन ईएसआईसी और अन्य योजनाओं के तत्काल खर्च से सरकारी व्यय बढ़ता है। यह एक वित्तीय चुनौती खड़ी करता है: बजट पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना या नियोक्ता योगदान को इतना न बढ़ाए कि प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) पर असर पड़े, इन बढ़ी हुई सुविधाओं का वित्तपोषण कैसे हो?
राजकोषीय स्थिरता पर सवाल
आलोचकों का मानना है कि सामाजिक सुरक्षा के तेजी से विस्तार से दीर्घकालिक राजकोषीय और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर सवाल उठते हैं। 2015 में 19% कवरेज से 2025 तक 64.3% तक पहुंचने की प्रभावशाली वृद्धि के बावजूद, योगदान और सरकारी आवंटन के माध्यम से धन जुटाने के तंत्र को पर्याप्त होना चाहिए। कुछ कल्याणकारी योजनाओं को लेकर चिंताएं हैं कि वे तत्काल जरूरतों को पूरा कर सकती हैं, लेकिन एक अस्थिर राजकोषीय बोझ पैदा कर सकती हैं और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के बजाय निर्भरता बढ़ा सकती हैं। पब्लिक हेल्थ पर जीडीपी का कम प्रतिशत यह दर्शाता है कि सामाजिक सुरक्षा के भीतर स्वास्थ्य संबंधी वादे अपने दायरे की तुलना में कम वित्त पोषित हो सकते हैं। इसके अलावा, भारत के 50 करोड़ श्रमिकों में से लगभग 90% अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र (informal sector) में हैं और श्रम कानूनों में पात्रता सीमा (eligibility thresholds) या विशिष्ट बहिष्करण (specific exclusions) के कारण सुरक्षा में अंतराल का सामना कर सकते हैं।
भविष्य की राह
सरकार का लक्ष्य सभी श्रमिकों को गरिमा, कल्याण और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वर्तमान पहलें इस दीर्घकालिक दृष्टिकोण के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाती हैं, जिन्हें सरल कानूनों और डिजिटल प्रणालियों का समर्थन प्राप्त है। इन बढ़ती प्रतिबद्धताओं के लिए राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना और श्रम सुधारों का प्रभावी ढंग से वास्तविक औपचारिकता और स्थायी आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, जो कल्याण कार्यक्रमों पर निर्भरता कम करे, भविष्य की सफलता की कुंजी होगी।
