अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनावों, सख्त होते जलवायु नियमों और संरक्षणवाद (protectionism) को देखते हुए, भारत अपनी एक्सपोर्ट पॉलिसी में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव कर रहा है। पारंपरिक एक्सपोर्ट सब्सिडी जैसे MEIS और RoDTEP पर निर्भर रहने के बजाय, सरकार अब देश के निर्यात को वैश्विक झटकों और अस्थिरता के प्रति अधिक लचीला (resilient) बनाने पर ज़ोर दे रही है।
हाल ही में अमेरिका-ईरान संघर्ष जैसी घटनाओं ने अहम शिपिंग रूट्स और वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया, जिससे यह साफ हो गया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार कितना अस्थिर हो सकता है। ऐसी स्थिति में, केवल मूल्य लाभ (price advantage) पर आधारित सब्सिडी की तुलना में संरचनात्मक मजबूती (structural strengths) के ज़रिए स्थायी प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) का निर्माण अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर और क्रेडिट पर जोर
2026-27 के बजट में इस बदलाव को साफ तौर पर देखा जा सकता है। सरकार सीधे वित्तीय सहायता के बजाय एक्सपोर्ट क्रेडिट और ट्रेड इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर रही है। एक्सपोर्ट क्रेडिट के लिए ₹7,295 करोड़ का पैकेज तैयार किया गया है, जिसमें ₹5,181 करोड़ इंटरेस्ट सब्वेंशन (ब्याज सब्सिडी) के लिए और ₹2,114 करोड़ कोलैटरल सपोर्ट के लिए रखे गए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को आसानी से फाइनेंसिंग दिलाने में मदद करना है।
इसके साथ ही, ₹12.2 लाख करोड़ के बड़े पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर प्रोग्राम के ज़रिए वाटरवेज, फ्रेट कॉरिडोर और कोस्टल शिपिंग जैसे प्रमुख लॉजिस्टिक्स रूट्स को बेहतर बनाया जाएगा, जिससे ऑपरेशनल कॉस्ट कम हो सके। कस्टम्स रिफॉर्म्स के तहत ड्यूटी डेफर्मेंट पीरियड को बढ़ाने और कूरियर एक्सपोर्ट पर लगी कैप को हटाने जैसे कदम भी उठाए जा रहे हैं। इन प्रयासों का असर दिखना भी शुरू हो गया है; FY 2023-24 में भारत की लॉजिस्टिक्स कॉस्ट GDP के 7.97% तक गिर गई है, जो कि पिछले अनुमानों से काफी बेहतर है और वैश्विक बेंचमार्क के करीब है।
EU का CBAM: नई कंप्लायंस चुनौतियां
इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा, भारतीय निर्यातकों को नए वैश्विक नियामक नियमों (regulatory demands) का सामना भी करना पड़ेगा। इसमें सबसे प्रमुख है यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM)। 2026 में अपने डेफिनिटिव फेज में प्रवेश करने वाला CBAM, आयात पर कार्बन प्राइसिंग लागू करेगा, जिसका असर स्टील, सीमेंट और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीय व्यवसायों पर पड़ेगा।
भारतीय MSMEs के लिए CBAM कई चुनौतियां पेश कर रहा है, जिनमें एमिशन डेटा को ट्रैक करने में दिक्कतें, कार्बन अकाउंटिंग के लिए मानकीकृत तरीके का अभाव और महत्वपूर्ण वेरिफिकेशन हर्डल्स शामिल हैं। इसके अलावा, देश का फॉसिल फ्यूल-हैवी एनर्जी ग्रिड भी यूरोपीय उत्पादकों की तुलना में स्थिति को और जटिल बनाता है। बजट ने इंटरेस्ट इक्वलाइजेशन स्कीम जैसी योजनाओं से किनारा कर लिया है और MSMEs के लिए 2.75% इंटरेस्ट सब्वेंशन पेश किया है, लेकिन सख्त कार्बन कंप्लायंस के अनुरूप ढलने के लिए भारी निवेश और तकनीकी अपग्रेड की ज़रूरत होगी।
आगे की राह: जोखिम और सफलता का पैमाना
सब्सिडी से सिस्टमैटिक कॉस्ट रिडक्शन (systemic cost reduction) की ओर यह महत्वाकांक्षी संरचनात्मक बदलाव (structural transition) अपने साथ कई एग्जीक्यूशन रिस्क (execution risks) लेकर आता है। उदाहरण के लिए, तीन साल के भीतर 50 प्रमुख एक्सपोर्ट क्लस्टर को एक्क्रेडिटेड कार्बन अकाउंटिंग फैसिलिटी से लैस करने का लक्ष्य, पिछली उन इंफ्रास्ट्रक्चर पहलों की याद दिलाता है जो प्रोजेक्ट रेडीनेस डिले (project readiness delays) की वजह से अटक गई थीं।
CBAM की ज़रूरतों को पूरा करने की जटिलता और लागत कई MSMEs के लिए बहुत ज़्यादा साबित हो सकती है। वर्तमान में केवल लगभग 61% MSMEs ही एक्सपोर्ट क्रेडिट इंश्योरेंस पॉलिसीज़ (export credit insurance policies) रखती हैं, ऐसे में उन्नत कंप्लायंस उपायों को व्यापक रूप से अपनाना अनिश्चित बना हुआ है, जिससे बड़ी कंपनियों और छोटी फर्मों के बीच खाई और चौड़ी हो सकती है। इसके अतिरिक्त, अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण वैश्विक शिपिंग पर पड़ने वाले प्रभाव जैसी मौजूदा भू-राजनीतिक अस्थिरता दर्शाती है कि बाहरी नाजुकता (external fragilities) घरेलू नीति प्रयासों को कैसे कमजोर कर सकती है।
सब्सिडी से सिस्टमैटिक कॉस्ट रिडक्शन की ओर भारत की रणनीतिक बदलाव की सफलता अंततः मापने योग्य परिणामों पर निर्भर करेगी। इसमें न केवल कुशल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और बेहतर एक्सपोर्ट क्रेडिट एक्सेस शामिल होगा, बल्कि देश की मजबूत कंप्लायंस सिस्टम बनाने और वैश्विक रेगुलेटरी डिस्कशन (regulatory discussions) में सक्रिय रूप से भाग लेने की क्षमता भी शामिल होगी। बजट ने एक संरचनात्मक बदलाव के लिए आधार तैयार किया है, लेकिन इसका दीर्घकालिक प्रभाव निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता (export competitiveness) में ठोस सुधार, घटी हुई संरचनात्मक लागत (structural costs) और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बदलती मांगों के प्रति निरंतर अनुकूलन (adaptation) से आंका जाएगा।