अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की नीतिगत बैठक में भले ही ब्याज दरों को 3.50%-3.75% की रेंज में स्थिर रखा गया हो, लेकिन बैठक में चार सदस्यों की असहमति ने बाज़ार को चौंका दिया। यह संकेत देता है कि फेडरल रिजर्व मॉनेटरी पॉलिसी को आसान (easing) बनाने में जल्दबाजी नहीं करेगा, जिससे ग्लोबल लिक्विडिटी पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
वहीं, इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 4% से ज़्यादा उछलकर करीब $123 प्रति बैरल पर पहुंच गईं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के बंदरगाहों पर अमेरिकी संभावित कार्रवाईयों से ग्लोबल ऑयल सप्लाई में और कमी आने का डर है। फरवरी के अंत से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 70% का इजाफा हो चुका है, जो कि जलडमरूमध्य होर्मुज (Strait of Hormuz) के आसपास की आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) की समस्याओं को और बढ़ा रहा है।
इन ग्लोबल दबावों के बीच भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ। डॉलर के मुकाबले यह 17 पैसे टूटकर 95.02 पर खुला और लगातार छठे सत्र में गिरावट दर्ज की। यह 30 मार्च के बाद पहली बार है जब रुपया 95 के पार गया। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब निवेशक अनिश्चितता के माहौल में जोखिम भरी संपत्तियों (riskier assets) से दूरी बना रहे हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के महंगाई (inflation) के पूर्वानुमानों को और बिगाड़ सकती हैं, जिससे घरेलू बॉन्ड यील्ड पर दबाव और बढ़ेगा। ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी के टाइट होने और कमोडिटी की बढ़ती कीमतों के इस संगम ने भारतीय नीति निर्माताओं और निवेशकों के लिए एक चुनौतीपूर्ण माहौल तैयार कर दिया है, जो बाज़ारों में और अधिक उथल-पुथल (volatility) का संकेत दे रहा है।
