तेल के दाम चढ़े, बॉन्ड यील्ड और रुपये पर गिरा दबाव
मंगलवार को भारतीय बॉन्ड मार्केट में गिरावट का रुख रहा, जिसमें बेंचमार्क 10-साल का यील्ड पिछले सत्र से 3 बेसिस पॉइंट बढ़कर 7.0627% पर पहुंच गया। बॉन्ड की गिरती कीमतों को दर्शाने वाला यह उछाल, अमेरिका-ईरान सीज़फायर डील को लेकर नई भू-राजनीतिक चिंताओं से सीधे तौर पर जुड़ा है। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जाकर $105 पर पहुंच गईं, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डील में महत्वपूर्ण असहमति जताई, जिससे यह अस्थायी शांति भंग होने का खतरा मंडरा रहा है। इस बढ़ी हुई तनातनी ने भारत के लिए इंफ्लेशन (मुद्रास्फीति) की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है। अनुमान है कि मार्च तक इंफ्लेशन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के 4% के लक्ष्य के करीब पहुंच सकता है। बढ़ती ऊर्जा आयात लागत भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटे) को और बिगाड़ रही है और रुपये पर दबाव बना रही है।
भू-राजनीतिक तनाव ने रुपया को पहुंचाया रिकॉर्ड निचले स्तर पर
भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 19 पैसे की गिरावट के साथ 95.50 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। यह कमजोरी वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई उछाल से सीधे तौर पर जुड़ी है, जिसके लिए आयात के वास्ते अधिक डॉलर की आवश्यकता होती है। मजबूत यूएस डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) भी उभरते बाज़ारों की करेंसी पर दबाव डाल रहा है। ऐतिहासिक रूप से, भू-राजनीतिक घटनाओं से उत्पन्न तेल की कीमतों में झटके रुपये को कमजोर करते रहे हैं, जो कच्चे तेल के लिए लगभग 85% आयात पर निर्भरता के कारण भारत की भेद्यता को उजागर करता है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है तो रुपये में लगातार उतार-चढ़ाव और और गिरावट की संभावना बनी रहेगी।
मार्केट की घबराहट के बीच अहम सरकारी बॉन्ड ऑक्शन पर नजर
निवेशक अब आज होने वाले एक महत्वपूर्ण सरकारी बॉन्ड ऑक्शन (bond auction) पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, जिसका उद्देश्य दो ऋण जारी करके ₹32,000 करोड़ जुटाना है। यह ऑक्शन मार्केट की घबराहट और बढ़ते यील्ड के बीच हो रहा है, और यह भारतीय सरकारी ऋण के लिए निवेशक की मांग का एक प्रमुख संकेतक साबित होगा। बेंचमार्क 10-साल का बॉन्ड यील्ड अप्रैल के अंत में 6.95% से लगातार बढ़ रहा है, जो इंफ्लेशन और भू-राजनीतिक जोखिमों के लिए निवेशकों द्वारा उच्च रिटर्न की मांग को दर्शाता है। पिछले ऑक्शन में भी यील्ड में बढ़त देखी गई थी, जिसमें 10-साल का यील्ड मार्च में इसी तरह के कच्चे तेल के मूल्य दबाव के बीच 7% के करीब पहुंच गया था। ऑक्शन का परिणाम सरकारी उधार की लागत और बाजार की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
आगे भी तेल के दबाव की आशंका: जेपी मॉर्गन और एचएसबीसी की रिपोर्ट
जेपी मॉर्गन (JP Morgan) का अनुमान है कि 2026 में ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य $96 प्रति बैरल रहेगा, जिसमें दूसरी और तीसरी तिमाही में $103-$104 के आसपास तिमाही औसत रहेगा। यह बताता है कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति आसान होने पर भी तेल बाज़ारों में कसाव बना रह सकता है। ये उच्च तेल की कीमतें भारत के इंफ्लेशन, करेंसी और बॉन्ड यील्ड पर पूरे साल दबाव बना सकती हैं। विश्लेषकों को उम्मीद है कि बढ़ती कीमतें जल्द ही भारत के इंफ्लेशन आंकड़ों को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे हेडलाइन इंफ्लेशन 4% के लक्ष्य के करीब या उससे थोड़ा ऊपर जा सकता है, खासकर यदि ईंधन की कीमतों पर सब्सिडी न दी जाए। एचएसबीसी (HSBC) के अर्थशास्त्रियों ने वित्तीय वर्ष 2027 के लिए इंफ्लेशन 5.6% रहने का अनुमान लगाया है और यदि इंफ्लेशन उच्च बना रहता है तो 2026 के अंत और 2027 की शुरुआत में दो ब्याज दर बढ़ोतरी की भविष्यवाणी की है।
