ग्लोबल दबाव बढ़ा
अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। खासकर मिडिल ईस्ट (Middle East) में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical tensions) के कारण क्रूड ऑयल (Crude oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इस बढ़त ने ग्लोबल इंफ्लेशन (Global inflation) की चिंताओं को फिर से जगा दिया है, जिससे पारंपरिक सेफ-हेवन एसेट्स (Safe-haven assets) से हटकर इंफ्लेशन के हिसाब से री-प्राइस (Repriced) होने वाले बॉन्ड्स की ओर रुझान बदल रहा है। बड़ी इकोनॉमीज पर इसका असर दिख रहा है, जहां US 10-year ट्रेजरी यील्ड (US 10-year Treasury yields) लगभग 4.45-4.55% पर है और जापानी यील्ड (Japanese yields) कई दशकों के हाई के करीब हैं। यह ग्लोबल दबाव स्वाभाविक रूप से भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स को प्रभावित कर रहा है।
RBI की पॉलिसी और महंगाई का अनुमान
घरेलू स्तर पर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India - RBI) अपना सतर्क रुख बनाए हुए है। हालांकि रेपो रेट (Repo Rate) 5.25% पर बना हुआ है, सेंट्रल बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary policy) अभी भी हॉकिश (Hawkish) है। महंगाई के अनुमानों को ऊपर की ओर संशोधित किया गया है, मुख्य रूप से ऊंचे तेल की कीमतों और इम्पोर्टेड इंफ्लेशन (Imported inflation) के जोखिम के कारण, जिससे तुरंत रेट कट (Rate cut) की संभावना काफी कम हो गई है। RBI की प्राथमिकता लिक्विडिटी (Liquidity) को मैनेज करना है, और फाइनेंशियल कंडीशंस (Financial conditions) को समय से पहले ढीला होने से रोकने के लिए सावधानीपूर्वक लिक्विडिटी मैनेजमेंट की अपनी पॉलिसी पर कायम है। भारत का बेंचमार्क 10-year गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड (Government bond yield) लगभग 7.14% तक बढ़ गया है, जो अंतरराष्ट्रीय दबावों और घरेलू महंगाई की चिंताओं दोनों को दर्शाता है।
लिक्विडिटी, नीलामी और बैंक रेगुलेशन्स
ब्रोडर प्रेशर (Broader pressures) के बावजूद, हाल ही में हुई एक गवर्नमेंट बॉन्ड ऑक्शन (Government bond auction) में मजबूत डिमांड देखी गई, जिससे शॉर्ट-कवरिंग एक्टिविटी (Short-covering activity) और सेंटिमेंट में संक्षिप्त सुधार के कारण यील्ड में अस्थायी गिरावट आई। रेगुलेटरी साइड पर, RBI ने बैंकों के लिए इन्वेस्टमेंट फ्लक्चुएशन रिजर्व (Investment Fluctuation Reserve - IFR) की आवश्यकता को खत्म कर दिया है। इससे बैंकों को इन फंड्स को कोर कैपिटल (Core capital) के रूप में री-क्लासिफाई (Reclassify) करने की अनुमति मिलती है, जिससे उनकी फाइनेंशियल पोजीशन मजबूत होती है। बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी (Banking system liquidity) काफी हद तक सरकारी खर्चों के कारण पर्याप्त बनी हुई है। हालांकि, RBI से उम्मीद की जाती है कि वह इस अतिरिक्त लिक्विडिटी को धीरे-धीरे अवशोषित करने के लिए वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (Variable Rate Reverse Repo - VRRR) नीलामी जैसे टूल्स का इस्तेमाल करेगा, जिसका लक्ष्य शॉर्ट-टर्म रेट्स (Short-term rates) को अलाइन करना और कंट्रोल बनाए रखना है।