सरकार की ओर से पेट्रोल और डीज़ल पर स्पेशल एक्साइज़ ड्यूटी घटाने के फैसले ने बाज़ार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इस फैसले का मकसद उपभोक्ताओं को कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचाना था, लेकिन इसकी बड़ी कीमत सरकार के फिस्कल हेल्थ (fiscal health) को चुकानी पड़ रही है। वहीं, ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम $110 प्रति बैरल के करीब बने हुए हैं, जिससे भारतीय बॉन्ड बाज़ार पर दबाव बढ़ गया है।
शुक्रवार को 6.48% 2035 बॉन्ड यील्ड 6.9419% पर बंद हुआ, जो कि जुलाई 2024 के अंत के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले हफ्ते 20 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी देखी गई, जो लगभग चार साल में सबसे बड़ी है।
आंकड़े बताते हैं कि इस ड्यूटी कट का खर्च हर दो हफ्ते में लगभग ₹7,000 करोड़ आएगा। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए इसका कुल फिस्कल इंपैक्ट ₹1.5 लाख करोड़ से ₹1.75 लाख करोड़ के बीच हो सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अक्टूबर की पॉलिसी में कच्चे तेल की कीमतें लगभग $70 प्रति बैरल मानी गई थीं। अब इन बढ़ी हुई कीमतों को देखते हुए RBI को अपनी महंगाई (inflation) की भविष्यवाणियों को बड़ा अपडेट देना पड़ सकता है, जिससे नीति निर्माताओं के लिए मुश्किल स्थिति पैदा हो सकती है।
इस बीच, ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (OIS) रेट्स में भी बड़ा उछाल आया है। एक साल का OIS रेट 6.04%, दो साल का 6.2750% और पांच साल का स्वैप रेट 6.6350% पर बंद हुआ। पिछले एक महीने में ये रेट्स क्रमशः 56, 69 और 65 बेसिस पॉइंट बढ़े हैं।
अनुमान लगाया जा रहा है कि FY2027 के लिए भारत का फिस्कल डेफिसिट जीडीपी का 5.5% तक पहुँच सकता है, जो सरकारी लक्ष्यों से ज़्यादा है और इससे सरकार का कर्ज़ बढ़ सकता है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें $110 प्रति बैरल पर बनी रहती हैं, तो FY2027 के लिए भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी का लगभग 3-3.5% तक बढ़ने का अनुमान है। इसके अलावा, फिस्कल सपोर्ट और कमोडिटी कीमतों का यह मेल हेडलाइन महंगाई को RBI के 2-6% के लक्ष्य को पार करा सकता है।
राज्यों सरकारों द्वारा इस हफ्ते करीब ₹1 लाख करोड़ का भारी डेट इश्यू भी बॉन्ड इन्वेस्टर्स पर दबाव बढ़ा रहा है और सभी सरकारी स्तरों पर उधार लेने की लागत बढ़ा सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर लगातार ऊँचे डेफिसिट को ठीक से नहीं संभाला गया तो यह क्रेडिट रेटिंग पर भी असर डाल सकता है।
भारतीय बॉन्ड बाज़ार का भविष्य आने वाले फिस्कल कंसॉलिडेशन उपायों, कच्चे तेल की कीमतों की ऊँची उड़ान और महंगाई पर RBI की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। अगर तेल की कीमतें ऊँची बनी रहती हैं और महंगाई बढ़ती है, तो बाज़ार को ज़्यादा रिस्क के बदले ज़्यादा यील्ड की ज़रूरत होगी। इससे ब्याज दरों में कटौती के अवसर सीमित हो सकते हैं और अर्थव्यवस्था के लिए उधार लेने की लागत ऊंची बनी रह सकती है।