ब्लू-कॉलर नौकरियों में बढ़ी मांग, सैलरी में आया उछाल
ब्लू-कॉलर सेक्टर में सैलरी में औसतन 8.60% की सालाना बढ़ोतरी साफ तौर पर स्पेशलाइज्ड ऑपरेशनल टैलेंट की ज़बरदस्त मांग को दिखाती है। यह ट्रेंड ऐतिहासिक रूप से उन रोल्स के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है जिन्हें पहले कम महत्व दिया जाता था। डिलीवरी जैसे सेक्टर्स में 16% तक और मैन्युफैक्चरिंग में 11% तक की ग्रोथ देखी गई है, जो इन ज़रूरी सर्विसेज़ के लिए टाइट लेबर मार्केट का संकेत है। यह भारत में बदलते जॉब मार्केट की तस्वीर पेश कर रहा है, जहाँ स्किल्ड मैनुअल और ऑपरेशनल लेबर की कद्र बढ़ रही है और उन्हें बेहतर कम्पन्सेशन मिल रहा है।
लैंगिक और भौगोलिक वेतन असमानता अब भी बड़ी चुनौती
सैलरी में हो रही इस तेज़ी के बावजूद, वेतन समानता की कहानी अभी अधूरी है। पुरुषों और महिलाओं के वेतन में एक बड़ा अंतर साफ दिख रहा है। 2025 में पुरुषों की औसत न्यूनतम सैलरी 8.24% बढ़कर ₹16,456 हुई, जबकि महिलाओं की सैलरी 5.67% बढ़कर सिर्फ ₹13,863 तक पहुंची। इसका मतलब है कि ज़्यादातर जॉब कैटेगरी में महिलाएं अब भी पुरुषों से काफी कम कमा रही हैं। इसके अलावा, शहरों के बीच भी सैलरी का बड़ा अंतर है। मेट्रो शहरों में एवरेज मिनिमम सैलरी (2025 में ₹17,618) छोटे शहरों के मुकाबले काफी ज़्यादा है। ये असमानताएं फेयर कम्पन्सेशन को लेकर एक मल्टी-लेयर्ड चुनौती को दर्शाती हैं।
पूरी वेतन समानता के रास्ते में रोड़े
IT सेक्टर का बेसलाइन सैलरीज में लगातार दबदबा बनाए रखना बताता है कि सच्ची वेतन समानता अभी दूर की कौड़ी है। भले ही ब्लू-कॉलर वेजेज़ मांग के कारण बढ़ रहे हों, लेकिन सबसे ज़्यादा सैलरी अभी भी टेक-ड्रिवन इंडस्ट्रीज़ में ही केंद्रित है। 2025 में IT सैलरीज में 15% की बढ़ोतरी के बाद ये औसतन ₹21,858 पर पहुँच गई हैं। इस कंसंट्रेशन का मतलब है कि ऑपरेशनल रोल्स सुधर रहे हैं, पर वे टॉप टेक सैलरीज के बराबर नहीं आ पा रहे हैं। इसके अलावा, स्किल्स की मांग-आपूर्ति से परे सिस्टमैटिक बैरियर्स भी लैंगिक वेतन अंतर को बढ़ा रहे हैं। महिलाएं अक्सर कम वेतन वाले रोल्स में ज़्यादा पाई जाती हैं और लीडरशिप पोज़िशन्स में उनकी संख्या कम है, जिससे उनकी कमाई की क्षमता सीमित हो जाती है। AMLEGALS की अगस्त 2025 की रिपोर्ट्स ने भी शहरी इलाकों में पुरुषों की औसत मंथली कमाई महिलाओं से काफी ज़्यादा होने की बात कही थी, जो यह दर्शाता है कि स्थानीय और सेक्टर-स्पेसिफिक हकीकतें अलग हैं।
आगे का रास्ता: सच्ची समानता के लिए खाई पाटना
WorkIndia के को-फाउंडर और CEO, नीलेश dungarwal (Nilesh Dungarwal) का कहना है कि भारत का जॉब मार्केट ब्लू-कॉलर रोल्स में मांग और स्किल की कमी के कारण "साइलेंट रीसेट" से गुज़र रहा है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि "लैंगिक अंतर और स्किल की असमानताएं अभी भी सैलरी पैरिटी में बाधा डाल रही हैं"। व्यापक वेतन समानता हासिल करने के लिए इन खास असमानताओं को दूर करने के साथ-साथ स्किल-ड्रिवन अवसरों को बढ़ावा देना होगा। 2025 के भारत के ओवरऑल इकोनॉमिक इंडिकेटर्स एक पॉजिटिव एम्प्लॉयमेंट आउटलुक दिखा रहे हैं, जिसमें मजबूत GDP ग्रोथ और घटती बेरोजगारी शामिल है, जो लगातार सैलरी सुधार के लिए एक सपोर्टिव माहौल का संकेत देते हैं। लेकिन, सच्ची समावेशिता तक पहुँचने के लिए लेबर मार्केट के भीतर मौजूदा गैप को पाटने के लिए केंद्रित प्रयासों की आवश्यकता होगी।