यह 6.48% मैच्योरिटी वाले सरकारी बॉन्ड (G-Sec) 2035 की री-इश्यू (Re-issue) नीलामी, सरकार के मौजूदा फिस्कल मैनेजमेंट (Fiscal Management) प्लान का एक अहम हिस्सा है। यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की बड़ी फंडिंग जरूरतों को पूरा करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
सरकार की फंडिंग की जरूरतें
सरकार का लक्ष्य फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए 4.4% GDP के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) लक्ष्य को हासिल करना है। इसके लिए, बजट में डेटेड सिक्योरिटीज (Dated Securities) से ₹11.54 लाख करोड़ के नेट मार्केट बॉरोइंग (Net Market Borrowing) और ₹14.82 लाख करोड़ के ग्रॉस बॉरोइंग (Gross Borrowing) का अनुमान लगाया गया है। अनुमान है कि मार्च 2026 तक कुल सरकारी देनदारियां GDP का करीब 56.1% हो जाएंगी। इस तरह की बड़े पैमाने पर जारी होने वाली सिक्योरिटीज, जिसमें 6.48% GS 2035 का री-इश्यू भी शामिल है, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और अन्य सरकारी खर्चों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बाजार संतुलन और यील्ड (Yield) की चाल
फिलहाल, 6.48% GS 2035 बॉन्ड का यील्ड (Yield) फरवरी 2026 के मध्य में 6.66% से 6.68% के आसपास बना हुआ है। यह स्थिरता भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से फरवरी 2026 में रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर बनाए रखने के बीच आई है, जिसे मुद्रास्फीति (Inflation) के नियंत्रण में रहने और मजबूत ग्रोथ का संकेत माना जा रहा है। RBI द्वारा वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) और ओपन मार्केट ऑपरेशन्स (OMOs) जैसे उपायों के जरिए लगातार लिक्विडिटी (Liquidity) प्रबंधन से बैंकिंग सिस्टम में अच्छी-खासी तरलता बनी हुई है, जो फरवरी 2026 में औसतन ₹2.70 लाख करोड़ रही। यह पर्याप्त लिक्विडिटी यील्ड में बड़ी उछाल को रोकने में मदद करती है, हालांकि सरकारी नीलामी से लगातार सप्लाई का दबाव बॉन्ड की कीमतों को प्रभावित कर सकता है। सरकार के बड़े कर्ज कैलेंडर के कारण निकट भविष्य में यील्ड 6.70%-6.75% की ओर बढ़ सकता है।
अंडरराइटिंग (Underwriting) मैकेनिज्म और PDs की भूमिका
इस नीलामी प्रक्रिया में प्राइमरी डीलर्स (Primary Dealers - PDs) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। ये संस्थाएं अंडरराइटर (Underwriter) और मार्केट मेकर (Market Maker) के तौर पर काम करती हैं। ये नीलामी में निश्चित मात्रा में सरकारी सिक्योरिटीज खरीदने का वादा करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि भले ही बाजार की मांग कम हो, सरकार अपने उधार लक्ष्य को पूरा कर सके। प्रतिस्पर्धी बोलियां (Competitive Bids) RBI के ई-कुबेर (e-Kuber) सिस्टम के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमा की जाती हैं।
जोखिम और संभावित गिरावट
स्थिरता के बावजूद, बॉन्ड मार्केट (Bond Market) कुछ जोखिमों का सामना कर सकता है। पूरे फाइनेंशियल ईयर के लिए सरकार द्वारा तय की गई भारी मात्रा में डेट जारी होने से यील्ड पर लगातार ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है, जिससे सरकार की उधारी लागत बढ़ सकती है। हालांकि मुद्रास्फीति नियंत्रण में है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं भी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा, GDP के मुकाबले सरकारी कर्ज का लगातार बढ़ना, भले ही इसे कम करने की योजना हो, निवेशकों के बीच लंबी अवधि की फिस्कल सस्टेनेबिलिटी (Fiscal Sustainability) को लेकर चिंताएं बढ़ा सकता है। कर्ज का बड़ा आकार निजी क्षेत्र के लिए क्रेडिट (Credit) तक पहुंच को सीमित करने का कारण भी बन सकता है, हालांकि RBI अपने लिक्विडिटी ऑपरेशन्स से इसे कम करने की कोशिश करता है।
भविष्य का नजरिया और निवेशकों का रुख
बाजार यह उम्मीद कर रहा है कि निवेशक लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड्स में अपनी रुचि बनाए रखेंगे, जैसा कि पिछली नीलामियों में देखा गया है। RBI की लिक्विडिटी प्रबंधन और उसकी स्थिर मौद्रिक नीति को बाजार के लिए सकारात्मक माना जा रहा है। हालांकि, निवेशक और विश्लेषक बोली राशि, कट-ऑफ यील्ड और अंडरराइटिंग स्प्रेड्स (Underwriting Spreads) पर बारीकी से नजर रखेंगे ताकि निवेशक की भावना और बेंचमार्क यील्ड की दिशा का अंदाजा लगाया जा सके। कुल मिलाकर, यह एक संतुलन साधने वाला कार्य प्रतीत होता है, जहां सरकार की लगातार सप्लाई को निवेशकों की सतर्क मांग के साथ मिलाया जाएगा, जो बदलते मैक्रोइकॉनॉमिक (Macroeconomic) हालात और वैश्विक जोखिमों के बीच है। विश्लेषकों का अनुमान है कि अगले 9 से 12 महीनों तक ब्याज दरें स्थिर रह सकती हैं।