इस फंड की जरूरत क्यों पड़ी?
पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष की वजह से ग्लोबल मार्केट में जबरदस्त वोलैटिलिटी (Volatility) देखी जा रही है। ऐसे में भारत जैसी इम्पोर्ट पर निर्भर अर्थव्यवस्था को बड़े झटके लगने का डर सता रहा है। खासकर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं, जिसका सीधा असर महंगाई और भारतीय रुपये पर पड़ रहा है। इस स्थिति से निपटने और अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने यह ₹1 लाख करोड़ का 'इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड' बनाने का प्रस्ताव रखा है।
सरकार की योजना और बजट
यह ₹1 लाख करोड़ का फंड, फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) के लिए ₹2.81 लाख करोड़ से अधिक की सप्लीमेंट्री डिमांड्स फॉर ग्रांट्स (Supplementary Demands for Grants) का हिस्सा है। इसमें फर्टिलाइजर (खाद) के लिए ₹19,230 करोड़, फूड सब्सिडी (PMGKAY) के लिए ₹23,641 करोड़, और डिफेंस (रक्षा) के लिए ₹41,822 करोड़ का भारी आवंटन भी शामिल है।
ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर का मानना है कि विभिन्न मंत्रालयों में होने वाली खर्चे की बचत (Expenditure Savings) इस फंड के नेट कैश आउटगो (Net Cash Outgo) को काफी हद तक कवर कर लेगी। इससे सरकार के फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) टारगेट, जो कि GDP का 4.3% है, पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, हाल ही में नॉमिनल GDP अनुमानों में आई गिरावट के चलते फिस्कल टारगेट को मैनेज करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्या फंड काफी होगा?
चिंता यह भी है कि अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है या और गंभीर हो जाता है, तो ₹1 लाख करोड़ का यह फंड शायद कम पड़ जाए। भारत अपनी जरूरत का 88.6% कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग रूट्स भी खतरे में हैं।
ऐतिहासिक तौर पर, ऐसे भू-राजनीतिक संघर्षों (Geopolitical Conflicts) से मार्केट में गिरावट आती है और वर्तमान व्यवधान (Disruptions) काफी अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह बड़ी चुनौती होगी कि वह कैसे इस फंड का इस्तेमाल करे।
आगे का रास्ता
सरकार ने पिछले फिस्कल टारगेट को संशोधित करके और टैक्स कलेक्शन में सुधार करके वित्तीय अनुशासन (Fiscal Prudence) पर अपना ध्यान दिखाया है। लेकिन, वित्त मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रभाव "लंबे समय तक रहने वाला" हो सकता है, जिसकी अभी पूरी तरह से कल्पना नहीं की जा सकती। इसका मतलब है कि भू-राजनीतिक स्थिति बदलने के साथ-साथ सरकार को अपनी फिस्कल स्ट्रेटेजी (Fiscal Strategy) पर लगातार नजर रखनी होगी और ज़रूरत पड़ने पर बदलाव करने होंगे। इस इकोनॉमिक स्टेबलाइजेशन फंड की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी चतुराई से इस्तेमाल किया जाता है और सरकार अल्पकालिक स्थिरता (Short-term Stability) को दीर्घकालिक वित्तीय स्वास्थ्य (Long-term Fiscal Health) के साथ कैसे संतुलित करती है।