IBC में बड़े बदलाव: अब तेज़ी से होंगे कॉर्पोरेट दिवालियापन के मामले, सरकार ने दी मंजूरी!

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
IBC में बड़े बदलाव: अब तेज़ी से होंगे कॉर्पोरेट दिवालियापन के मामले, सरकार ने दी मंजूरी!
Overview

भारत की संसद ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) में बड़े सुधारों को मंजूरी दे दी है। इन नए बदलावों के तहत कॉर्पोरेट बचाव की प्रक्रिया को तेज करने के लिए कड़ी समय-सीमाएं तय की गई हैं और कोर्ट के बाहर समझौते का विकल्प भी जोड़ा गया है।

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दिवालियापन के मामलों में आएगी तेज़ी

लोकसभा ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) में महत्वपूर्ण संशोधन (amendments) को मंजूरी दे दी है, जिसका उद्देश्य कॉर्पोरेट दिवालियापन (insolvency) को संभालने के तरीके में बड़ा बदलाव लाना है। यह कानून सख्त समय-सीमाएं (timelines) तय करता है और कोर्ट के बाहर समझौते (out-of-court settlements) का रास्ता भी खोलता है। ये कदम तनावग्रस्त संपत्तियों (stressed assets) के समाधान की दक्षता (efficiency) को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

कॉर्पोरेट बचाव के नियमों में सुधार

इन संशोधनों का उद्देश्य हितधारकों (stakeholders) के लिए वैल्यू को अधिकतम करना और दिवालियापन की कार्यवाही (proceedings) के समग्र शासन (governance) को बेहतर बनाना है। ये वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं (global best practices) को भी एकीकृत करते हैं, जिसमें समूह (group) और क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी (cross-border insolvency) के प्रावधान शामिल हैं। इस पहल को देश के बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत करने में एक महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

सख्त डेडलाइन और जुर्माने का प्रावधान

मंजूर किए गए बिल में दिवालियापन आवेदनों (applications) के स्वीकार होने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित (streamlined) किया गया है। यदि डिफ़ॉल्ट (default) स्थापित हो जाता है, तो इसे 14 दिनों के भीतर संसाधित (process) करने की आवश्यकता होगी। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपीलों को तीन महीनों के भीतर हल करने का लक्ष्य रखा गया है। देरी को रोकने के लिए ₹1 लाख से ₹2 करोड़ तक के जुर्माने (penalties) का प्रावधान किया गया है, जो पहले अदालती मामलों में देरी का कारण बनते थे।

नया सेटलमेंट मॉडल, क्रेडिटर अब आगे

एक नया क्रेडिटर-इनीशिएटेड इनसॉल्वेंसी फ्रेमवर्क (creditor-initiated insolvency framework) पेश किया गया है, जो पहले इस्तेमाल में कम आए फास्ट-ट्रैक प्रोसेस (fast-track process) की जगह लेगा। यह मॉडल कोर्ट के बाहर शुरुआत की अनुमति देता है और इसमें मैनेजमेंट या क्रेडिटर की निगरानी (oversight) शामिल हो सकती है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को 30 दिनों के भीतर समाधान योजनाओं (resolution plans) को मंजूरी या अस्वीकार करना होगा। कोर्ट के बाहर क्रेडिटर-इनीशिएटेड समाधान प्रक्रियाओं के लिए 150 दिनों का एक कंप्रेस्ड (compressed) समय-सीमा तय की गई है।

IBC का रिकवरी में योगदान

समर्थकों का कहना है कि IBC ने पहले ही बैंकिंग क्षेत्र की रिकवरी (recoveries) में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कुल ₹1,04,099 करोड़ की रिकवरी में से ₹54,528 करोड़ IBC चैनल से आए हैं। इसके अलावा, मालिकाना हक खोने के डर से औपचारिक प्रवेश से पहले ₹14.62 लाख करोड़ के 32,179 मामलों का निपटारा (settlement) हुआ है। रिजॉल्यूशन (resolutions) और लिक्विडेशन (liquidations) का अनुपात (ratio) भी काफी बेहतर हुआ है।

कर्मचारी बकाए को प्राथमिकता

संशोधनों में यह सुनिश्चित किया गया है कि कर्मचारियों के बकाए (dues) को प्राथमिकता मिले। उन्हें सुरक्षित क्रेडिटर (secured creditors) के बराबर माना जाएगा और असुरक्षित वित्तीय क्रेडिटर (unsecured financial creditors) व सरकारी बकाए से ऊपर रखा जाएगा। इस उपाय का उद्देश्य कॉर्पोरेट दिवालियापन की कार्यवाही के दौरान कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.