यूनियन कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए एक नई नीति का ऐलान किया है। अब भारत में निवेश का मूल्यांकन कंपनियों के मालिकाना हक (Ownership) पर नहीं, बल्कि उनके आउटपुट, यानी नौकरियों के सृजन और वैल्यू एडिशन पर होगा। इसका मकसद 'चाइना+1' स्ट्रैटेजी से आगे बढ़कर लंबी अवधि की ग्रोथ हासिल करना है।
नई नीति का मकसद: 'आउटकम' पर जोर
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कर दिया है कि भारत अब उन कंपनियों को बढ़ावा देगा जो देश में असल में कुछ बना रही हैं और रोजगार पैदा कर रही हैं। चाहे कंपनी विदेशी हो या घरेलू, अब सबको बराबरी का मौका मिलेगा। कंपनियों को सपोर्ट देने या उनकी पात्रता तय करने का मुख्य आधार अब यह नहीं होगा कि कंपनी किसकी है, बल्कि यह देखा जाएगा कि वे भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना योगदान दे रही हैं – जैसे कि कितनी नौकरियां पैदा कीं, कितना कैपिटल इन्वेस्ट किया और लोकल वैल्यू एडिशन कितना किया। यह एक 'आउटकम-बेस्ड' यानी परिणाम-आधारित आर्थिक नीति की ओर एक बड़ा कदम है।
'चाइना+1' से आगे की सोच
सरकार की मंशा है कि दुनिया भर की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को सिर्फ एक वैकल्पिक सप्लाई चेन के तौर पर न देखें, बल्कि अपने ग्लोबल ऑपरेशंस का एक अहम बेस बनाएं। इस नई नीति से भारत की लागत प्रतिस्पर्धा (Cost Competitiveness) और बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता का फायदा उठाने की कोशिश की जाएगी, ताकि 'चाइना+1' जैसे मौजूदा ग्लोबल ट्रेंड्स से आगे बढ़कर भी निवेशकों की रुचि बनी रहे। इसी के तहत, भारत-यूरोपीय फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के शुरुआती चरण के माध्यम से 15 वर्षों में $100 बिलियन के निवेश लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में भी काम चल रहा है।
ट्रेड और प्रोटेक्शनिज्म की हकीकत
जहां सरकार ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही है, वहीं आधुनिक वैश्विक व्यापार की जटिलताओं से भी निपटना होगा। मिनिस्टर गोयल ने ग्लोबल प्रोटेक्शनिज्म में वृद्धि का जिक्र किया, खासकर स्टील जैसे औद्योगिक सेक्टरों में। इससे दूसरे देशों से सस्ते माल की डंपिंग जैसी अनुचित व्यापार प्रथाओं को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, जो स्थानीय निर्माताओं को नुकसान पहुंचा सकती हैं। सरकार इन वैश्विक व्यापारिक गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए है। 2009-10 के फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स से मिले सबक, जिनकी आलोचना हुई थी कि उन्होंने पर्याप्त घरेलू औद्योगिक समर्थन के बिना आयात में भारी वृद्धि की, वे वर्तमान नीति के लिए एक संदर्भ बिंदु बने हुए हैं। अब प्रशासन का जोर इस बात पर है कि भारतीय उद्योग आज एक दशक पहले की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक सक्षम और वैश्विक बाजारों में बेहतर ढंग से एकीकृत है।
इनोवेशन और R&D पर फोकस
सरकार 'हाई-रिस्क' वाले इनोवेशन को बढ़ावा देने की ओर भी बढ़ रही है। अधिकारियों का कहना है कि सरकार ऐसे 'आउट-ऑफ-द-बॉक्स' विचारों का समर्थन करने के लिए तैयार है जिनमें जोखिम अधिक हो, लेकिन लंबे समय में विकास की अपार संभावनाएं हों। इस पहल का लक्ष्य भारत की रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) लागत का लाभ उठाना है, जो स्विट्जरलैंड जैसे विकसित देशों की तुलना में कम है। मकसद यह है कि भारत ग्लोबल R&D गतिविधियों का केंद्र बने और कंपनियां अपने इनोवेशन सेंटर्स को देश में शिफ्ट करने के लिए प्रोत्साहित हों।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को इस बात पर बारीकी से नजर रखनी होगी कि नीतिगत घोषणाएं किस तरह से सेक्टर-स्पेसिफिक एक्शन में तब्दील होती हैं। सबसे अहम बात यह होगी कि सरकार ट्रेड बैरियर्स, खासकर स्टील जैसे कमोडिटी-आधारित सेक्टरों में डंपिंग के जोखिमों को कैसे देखती है। इसके अलावा, EFTA समझौते और अन्य द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं की प्रगति, संभावित कैपिटल इनफ्लोज के महत्वपूर्ण संकेतक होंगे। जो कंपनियां सरकार के हाई-वैल्यू क्रिएशन और जॉब जनरेशन पर फोकस के साथ अपने बिजनेस मॉडल को अलाइन करेंगी, उन्हें इस नीतिगत बदलाव का सबसे ज्यादा फायदा मिलने की संभावना है। R&D से जुड़े इंसेंटिव्स के कार्यान्वयन को ट्रैक करने से यह भी पता चलेगा कि सरकार लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए किन उद्योगों को प्राथमिकता देना चाहती है।
