इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भारत का बड़ा लक्ष्य: 2030 तक $150 अरब का आंकड़ा पार करने की तैयारी!

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AuthorNeha Patil|Published at:
इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में भारत का बड़ा लक्ष्य: 2030 तक $150 अरब का आंकड़ा पार करने की तैयारी!

भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को 2030 तक **$150 अरब** तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। यह फैसला एक हाई-लेवल सरकारी बैठक के बाद लिया गया है। पिछले फाइनेंशियल ईयर 2026 में इस सेक्टर के एक्सपोर्ट में **24.7%** की शानदार ग्रोथ देखने को मिली थी, जो करीब **$48 अरब** तक पहुंच गई थी। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि अब ग्लोबल वैल्यू चेन में जुड़ने और डोमेस्टिक कंपोनेंट इकोसिस्टम को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा।

'चिंतन शिविर' में बनी रणनीति

नई दिल्ली में आयोजित एक 'चिंतन शिविर' में भारत को ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की रणनीति बनाई गई। इस बैठक में Apple, Samsung और Foxconn जैसी बड़ी ग्लोबल कंपनियों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। यहीं पर 2030 तक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को $150 अरब तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया। यह पहल पिछले फाइनेंशियल ईयर के शानदार प्रदर्शन के बाद आई है, जब इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में 24.7% की बढ़ोतरी हुई और यह लगभग $48 अरब पर पहुंच गया।

पॉलिसी का फोकस और एक्सपोर्ट ग्रोथ

कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक स्थिर और भरोसेमंद पॉलिसी फ्रेमवर्क की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि ग्लोबल मार्केट के लिए मैन्युफैक्चरिंग के नियम, घरेलू खपत के लिए बनने वाले प्रोडक्ट्स से अलग होंगे। एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड यूनिट्स के लिए खास पॉलिसी बनाकर सरकार लागत कम करने और बिजनेस की रफ्तार बढ़ाने का इरादा रखती है। इस रोडमैप में खासकर स्मार्टफोन्स, सर्वर्स और खास इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स जैसी हाई-ग्रोथ कैटेगरी पर फोकस किया जाएगा, जिन पर भारत अपनी ग्लोबल मार्केट हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है।

कंपोनेंट इकोसिस्टम को मजबूती

इस रणनीति का एक अहम हिस्सा लोकल सेमीकंडक्टर और कंपोनेंट इकोसिस्टम का विकास है। फिलहाल, भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हिस्सा सिर्फ असेंबलिंग पर टिका है, जिसके लिए कंपोनेंट्स इंपोर्ट करने पड़ते हैं। इन पार्ट्स के लिए डोमेस्टिक बेस को मजबूत करना एक्सपोर्ट के 'वैल्यू-एडेड' हिस्से को बढ़ाएगा। यह निवेशकों के लिए ट्रैक करने वाली बात है, क्योंकि लोकल सोर्सिंग से समय के साथ डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स के मार्जिन में सुधार हो सकता है। हालांकि, इस इकोसिस्टम को बनाने में भारी पूंजी निवेश की जरूरत होगी और यह लंबे समय तक चलने वाला प्रोसेस है, जिससे इसमें शामिल कंपनियों के नियर-टर्म कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है।

MSMEs की भूमिका और ट्रेड फैसिलिटेशन

सरकार और इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को शामिल करने पर भी चर्चा की। HS कोड्स (ट्रेड होने वाले प्रोडक्ट्स के नामकरण की स्टैंडर्ड सिस्टम) को हार्मोनize करने और कस्टम्स कोऑर्डिनेशन को बेहतर बनाने की योजना है, ताकि सामान इंटरनेशनल मार्केट तक पहुंचने में लगने वाले समय को कम किया जा सके। डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड के साथ मिलकर ट्रेनिंग प्रोग्राम भी लॉन्च करेगा। इसका मकसद छोटे एक्सपोर्टर्स को कॉम्प्लेक्स इंटरनेशनल ट्रेड एग्रीमेंट्स को समझने और बेहतर मार्केट एक्सेस हासिल करने में मदद करना है।

निवेशकों को नई कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज के असल कमीशनिंग और सिंपल असेंबली से कॉम्प्लेक्स मैन्युफैक्चरिंग में बदलने की कंपनियों की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए। एक्सपोर्ट ग्रोथ का ट्रेंड पॉजिटिव है, लेकिन इन लक्ष्यों की अंतिम सफलता सस्टेंड ग्लोबल डिमांड, कॉम्पिटिटिव लेबर कॉस्ट बनाए रखने की क्षमता और ट्रेड बैरियर्स को कम करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और पॉलिसी प्रोजेक्ट्स के सफल एग्जीक्यूशन पर निर्भर करेगी।

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